’’मितान’’ नारियल, महाप्रसाद, गंगाजल और जवारा देकर निभाते हैं जीवनभर का रिश्ता.... मितान दिवस

- डॉ. जीतेन्द्र सिंगरौल, तथागत बुद्ध चौक, मोछ (तखतपुर), जिला बिलासपुर (छत्तीसगढ़) 495003 मोबाईल-9425522629, 8319868746 ईमेल:- [email protected] https://www.facebook.com/jkumar009 https://twitter.com/jkumar001

’’मितान’’ नारियल, महाप्रसाद, गंगाजल और जवारा देकर निभाते हैं जीवनभर का रिश्ता....  मितान दिवस

आज जब फ्रेंडशिप डे पर लोग सोशल मीडिया के जरिए दोस्ती का इजहार करते हैं, तब छत्तीसगढ़ राज्य की ‘‘मितान’’ परंपरा याद दिलाती है कि सच्ची दोस्ती केवल एक दिन मनाने का नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी निभाने का नाम है। छत्तीसगढ़ में सदियों से दोस्ती को जीवनभर निभाने की एक अनूठी परंपरा रही है, जिसे ’’मितान बदना’’ कहा जाता है। यह केवल दोस्त बनने की रस्म नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक और भावनात्मक रिश्ता है, जिसे मरते दम तक निभाया जाता है। मितान बनने के बाद दोनों लोग एक-दूसरे को सगे रिश्तेदारों से भी बढ़कर मानते हैं। यह रिश्ता केवल दो लोगों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है। इस परंपरा में जाति, समाज या परिवार का कोई बंधन नहीं होता। कोई भी व्यक्ति किसी भी जाति या समुदाय के व्यक्ति को अपना मितान बना सकता है। मितान बनने के बाद एक-दूसरे का नाम लेकर नहीं पुकारा जाता। यह सम्मान और आत्मीयता का प्रतीक है। त्योहारों में भोजन का आदान-प्रदान भी किया जाता है।

ज्ञातव्य हो कि छत्तीसगढ़ में राखी के दूसरे दिन भोजली तिहार के दिन ”मितान” बनाने की परंपरा है अर्थात छत्तीसगढ़ में ”मित्रता दिवस” ;थ्तपमदकेीपच क्ंलद्ध रक्षा बंधन के दूसरे दिन को माना जाता है। आपको बताते चले कि छत्तीसगढ़ में मित्रता के लिए कई पावन नाम व परंपरा भी है जैसे- गंगाजल, भोजली, जंवारा, महाप्रसाद, गजामूंग, तुलसीदल, गोदना, गिंयाँ इत्यादि।

भोजली क्या है?:-
माह भाद्र पद्वा की शुक्ल अमावस्या तक खेतों में धान की बुआई व प्रारंभिक निराई-गुडाई का काम समापन की ओर होता है। किसानों की लड़कियाँ अच्‍छी वर्षा एवं भरपूर भंडार देने वाली फसल की कामना करते हुए फसल के प्रतीकात्‍मक रूप से भोजली का आयोजन करती हैं। भोजली गेहूं /ज्वार के बीज को भिगोकर बांस के एक टोकरी में मिट्टी और खाद डाल कर उसमे गेहूं बीज को डाला जाता है तथा उनमें रोज़ पानी देते हुए देखभाल की जाती है; जिससे गेंहू के दाने धीरे-धीरे पौधे बनकर बढ़ते हैं,  महिलाएं इस पौधे (भोजली) को देवी के समान मानकर पूजा करती है। गेहूं से पौधे जो अंदर छांव में तैयार किया जाता है; उसे ही छत्तीसगढ़ी में ’भोजली’ कहते है। इस भोजली को पहले नागपंचमी के दिन कुवारी मिट्टी लाकर बोया जाता था, लेकिन अब इसे पंचमी से लेकर नवमी तिथि तक बोया जाता है। 

भोजली तिहार अथवा मित्रता दिवस कैसे मनाया जाता हैं?
भोजली तिहार छत्तीसगढ़ की उस लोक परंपरा का जीवंत प्रतीक है; जहाँ फसल की हरियाली और मित्रता का बंधन एक साथ पल्लवित होते हैं। भाद्र कृष्ण प्रतिपदा को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल कृषि समृद्धि की कामना नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और स्नेह का उत्सव भी है। राखी के दूसरेे दिन जब गाँव की युवतियाँ भोजली दाई की पूजा कर तालाबों की ओर गीत गाती हुई जाती हैं, तब यह दृश्य छत्तीसगढ़ी लोकजीवन की आत्मा को साकार करता है। भोजली की दूब कान में खोंचकर “मितान” बनने की परंपरा इस पर्व को मित्रता दिवस का रूप देती है। इस दिन महिलाएं और कुंआरी कन्याएं भोजली को लेकर पांपरिक गीत गाते हुए तालाब में विसंर्जन के लिए जाती है; इन्हें भोजली गीत कहते हैं और ये कुछ इस तरह से होते हैं:-
देवी गंगा! देवी गंगा!! लहर तिरंगा!!!
हमरो भोजली दाई के, भिगे आठों अंगा!!!
आहो देवी गंगा.....

भोजली विसर्जन के समय लोग उत्साह से गाते और बाजे बजाते हुए गांव के मुख्य गलियों से होते हुए तालाब में जाते है। सभी पारंपरिक रस्मों के साथ युवक, महिलाएं और युवतियों द्वारा भोजली की टोकरियां सिर पर रखकर नदी या तालाब किनारे भोजली गीत गाते हुए नारियल फोड़कर भोजली को नदी में विसर्जित किया जाता है। भोजली को नदी, तालाब और सागर में विसर्जित करते हुए अच्छी फ़सल की कामना की जाती है। भोजली विसर्जन के बाद इसके ऊपरी हिस्से को बचा कर रख लिया जाता है; जिसे लोग एक-दूसरे के कानों में खोंचकर भोजली, गियां, मितान, सखी, महाप्रसाद, दोनापान बदते हैं। कान में भोजली खोंचकर मितानी के अटूट बंधन में बंधने का पर्व भोजली तिहार मनाया जाता है। इस प्रकार छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में भोजली को कान में लगाकर मित्र बनाए जाते हैं और इस मित्रता को जीवन भर निभाया जाता है। इसके बाद, सभी को प्रसाद दिया जाता है और फिर लोग अपने-अपने घर लौट जाते हैं। 

ऐसे बनते हैं मितानः मितान बनने की कई परंपराएं हैं-
कुछ लोग आपस में नारियल देकर मितान बदते है तथा जो लोग भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद को साक्षी रखकर अथवा संकल्प लेकर मित्रता करते है, उसे ’महाप्रसाद’ और जो लोग गंगाजल, तुलसी दल, जवारा एवं भोजली के माध्यम से मितान बनाते है; उसे क्रमशः गंगाजल, तुलसी दल, जवारा व भोजली मितान कहा जाता है। हर विधि का संदेश एक ही होता है, भरोसा, अपनापन और जीवनभर साथ निभाने का वचन।

इस प्रकार भोजली पर्व, छत्तीसगढ़ लोगों के लिए बहुत अहम स्थान रखता है। राज्य के अधिकतर ग्रामीण इलाकों में लोग एक- दूसरे को भोजली का दूब भेंट कर जीवन भर मित्रता का धर्म निभाने का संकल्प लेते हैं। भोजली तिहार को ब्रज और उसके निकटवर्ती प्रान्तों में भुजरियाँ कहते हैं। कई स्थानों में इसे कजलियॉ, फुलरियाृ, धुधिया, धैंगा और जवारा (मालवा) या भोजली भी कहते हैं। इस दिन को छत्तीसगढ़ राज्य में मितान दिवस / मित्रता दिवस कहे, तो ज्यादा प्रासंगिक होगा।