देवशयनी एकादशी 2026: व्रत की तिथि, महत्व, पूजन विधि व चातुर्मास आरंभ
25 जुलाई को देवशयनी एकादशी है । चतुर्मास साधना का सुवर्णकाल माना गया है और यह एकादशी इस सुवर्णकाल का प्रारम्भ दिवस है ।
देवशयनी एकादशी तिथि और मुहूर्त
आषाढ़ एकादशी तिथि प्रारंभ – 24 जुलाई 2026 को शाम 06:12 बजे
आषाढ़ एकादशी तिथि समाप्त – 25 जुलाई 2026 को रात 08:10 बजे
पारण (उपवास तोड़ने) का समय – 26 जुलाई 2026 को सुबह 05:39 से 08:22 के बीच
देवशयनी एकादशी का क्या महत्व है
राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा : ‘‘प्रभु ! आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम और उसका माहात्म्य क्या है ? मैं आपके श्रीमुख से सुनना चाहता हूँ ।’’
श्रीकृष्ण ने कहा : ‘‘युधिष्ठिर ! आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम शयनी (देवशयनी) है। इसको हरिशयनी एकादशी भी बोलते हैं । यह पुण्यपुंज देनेवाली, भगवान श्रीहरि को संतुष्ट करनेवाली, सर्वपापनाशक, आरोग्यवर्धक, दोषों को हरनेवाली, गुणों को भरनेवाली तथा स्वर्ग और मोक्ष देनेवाली है । इसका व्रत उत्तम व्रत है । इसे रखने से तीनों सनातन देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की पूजा का फल मिलता है, तीनों लोकों के पवित्र तीर्थों का सेवन करने का फल होता है ।
हरिशयनी एकादशी से कार्तिकी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) तक चतुर्मास होता है । चतुर्मास में मेरा एक रूप राजा बलि के पास रहता है और दूसरा रूप शेषशय्या पर तब तक शयन करता है जब तक कार्तिकी एकादशी नहीं आ जाती । इन दिनों में किया हुआ जप, संयम, दान, उपवास, मौन विशेष हितकारी, पुण्य व साफल्य दायी है ।
जो मनुष्य इस एकादशी व्रत का अनुष्ठान करता है वह परम गति को प्राप्त होता है । इसलिए यत्नपूर्वक इस एकादशी का व्रत करना चाहिए ।
इस दिन किया गया रात्रि-जागरण (रात्रि 12 बजे तक), मौन, उपवास और भगवत्सुमिरन मनुष्य को तमस और रजस से उन्नत करके सात्त्विक धन से सम्पन्न कर देता है । सात्त्विक धन होगा तो इन्द्रियों का तेज, मन-बुद्धि का तेज बढ़ेगा, क्या करणीय और क्या अकरणीय है उसका प्रकाश होगा और दिव्य ज्ञान की प्रेरणाएँ प्राप्त होंगी ।
चातुर्मास में क्या करें, क्या न करें?
चतुर्मास में दीपदान करनेवाले की बुद्धि, विचार और व्यवहार में ठीक ज्ञान के प्रकाश की वृद्धि होती है । पलाश के पत्ते पर किया गया भोजन बड़े-बड़े पातकों का नाशक है, ब्रह्मभाव को प्राप्त करानेवाला होता है ।
इस एकादशी से कार्तिकी एकादशी तक भगवान क्षीरसागर में योगनिद्रा में शयन करते हैं, समाधि में, अपने योग स्वभाव में, शांत स्वभाव में, ब्रह्मानंद स्वभाव में रहते हैं । अतः मनुष्य को धरती पर दरी या कम्बल बिछाकर (या गद्दा-तकिया हटा के पलंग पर सादा बिस्तर अथवा कम्बल बिछा के) शयन करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए । भगवान विष्णु के योगनिद्रा-काल में संयम और ब्रह्मचर्य का पालन व्यक्ति के जीवन में बड़ी सुख-शांति और भगवत्प्रीति देनेवाला है ।
सावन में साग, भादों में दही, आश्विन में दूध तथा कार्तिक में दाल व करेला का त्याग कर देना चाहिए ।
देवशयनी एकादशी को सुबह उठकर संकल्प करना चाहिए कि ‘यह चतुर्मास के आरम्भवाली एकादशी है । पापों का नाश करनेवाली यह एकादशी भगवान नारायण को प्रिय है । मैं उनको प्रणाम करता हूँ । आज के दिन मैं मौन रहूँगा, व्रत रखूँगा और अपने हृदय में भगवत्प्रीति उभारूँगा ।’
चतुर्मास की सभी एकादशियों का उपवास गृहस्थी के लिए करने योग्य है । बाकी के महीनों में गृहस्थी केवल शुक्ल पक्ष की एकादशी का ही उपवास करे, कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत न करे तो चल जायेगा अर्थात् वर्षभर में 12 एकादशी शुक्ल पक्ष की और 4 एकादशी कृष्ण पक्ष की – कुल मिला के गृहस्थी को 16 एकादशियों का व्रत (उपवास) करना चाहिए।