साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति रहस्यमय लोक से

प्रदीप नायक प्रदेश अध्यक्ष सदगुरु कबीर सेना छत्तीसगढ़

साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति रहस्यमय लोक से

"भगवान शंकर की पूरी काशी की यात्रा "


   मैं निश्चय किया कि काशी संग्रीला की घाटी, हिमालय की कुबेर पुरी(अलका पुरी) के साथ अंतरिक्ष लोकों का भ्रमण किया जाए। इसके लिए प्रथम यात्रा का सूत्र काशी से ही हस्तगत हुआ। कहीं जाने के लिए किसी का सहारा लेना पड़ता है। यदि कोई सूत्र हस्तगत हो गया या कोई परिचय मिल गया तो उत्तम है। अन्यथा अकेले अनजान व्यक्ति एवं स्थान पर भटकाव ज्यादा होता है। बहुत गुह्य जगह स्थान छूट भी जाते हैं। मेरा परिचय काशी के क्षेत्रपाल भैरव जी से हो गया था। गणपतिजी से भी सामंजस्य स्थापित कर लिया था।.

एक दिन सुबह दस बजे भोजन के पश्चात् अपने कक्ष में विश्राम हेतु प्रवेश ही किया था कि यात्रा की इच्छा हुई। मैं अपने कक्ष के दरवाजे का कुण्डी लगा दिया। बैठकर गुरु की स्तुति की। सहसा गुरु की आवाज मेरे कानों में गूंज उठी। तुम दिव्य काशी जाना चाहते हो जाओ परंतु किसी से कुछ भी मांगना मत मांगना ही लघुता है। अपने स्वभाव में स्थिर रहना, जो प्रारब्धानुसार मिल जाए उसमें संतोष रखना ही राजवृत्ति है। गुरु हर समय शिष्य की मदद करता है।

कुछ ही क्षण में हमारे कक्ष की खिड़की अनायास खुल गयी जिसके आहट से मेरा नेत्र खुल गया। देखता हूं—अपलक - प्रकाश की किरणें अंदर आ रही है। कक्ष के फर्श पर एक जगह केंद्रीभूत हो रही है। देखते ही देखते पीतवर्ण सुंदर पुरुष का स्वरूप धारण कर लिए। वह पुरुष हाथ जोड़कर मधुर भाषा में बोला- स्वामीजी को मेरा प्रणाम है। मेरी तंद्रा खुली। प्रति उत्तर में मैं भी उन्हें प्रणाम किया वे बोले-मैं भैरव हूं। आपका संदेश मिला है। आप काशी परिभ्रमण करना चाहते हैं। मेरे मुंह से निकला हां! काशी देखना चाहता हूं। परंतु आज आपका - रंग-रूप बदल गया है।

भैरव-स्वामीजी यह रंग रूप तो संकल्प शक्ति पर निर्भर करता है। मैंने कैसे ?

भैरव जी - देखिए ! हमारा कोई भी स्थूल शरीर नहीं है। कारण शरीर अति लघु एवं हल्का है। उसमें गति एवं समय का भान समाप्त हो जाता है। उसी से सृष्टि के किसी कोने में, कभी भी, किसी क्षण पहुंचा जा सकता है। एक ही समय में विभिन्न स्थानों पर प्रकट होकर विभिन्न कार्य का सम्पादन किया जा सकता है। इससे कारण शरीर को तोड़ना नहीं पड़ता न ही विभिन्न भागों में विभक्त करना पड़ता है। एक ही संकल्पशक्ति से बहुत रूपों में बहुत जगह प्रकट हो जाता है। जैसे एक ही व्यक्ति शीशे के घर में बहुत रूपों में दृष्टिगोचर होता है। मैंने पूछा, क्या आप अभी भी विभिन्न जगहों में इस समय उपस्थित हैं।

भैरव जी - जी हां! एक रूप से काशी की सेवा में हूं। दूसरे रूप से भगवान शंकर की सेवा में। तीसरे रूप से भक्तों की सेवा में, चौथा रूप-विभिन्न रूपों में विभिन्न जगह। जहां मेरी आवश्यकता है। प्रमुख एवं पांचवां रूप से आपकी सेवा में उपस्थित हूं। मैंने पूछा आप तो देव योनि में हैं। इसका क्या रहस्य है?

भैरव जी-स्वामीजी! सभी योनियों का रहस्य मानव योनि है। मानव अपने कर्मों के आधार पर विभिन्न योनियों में, विभिन्न लोकों में जाता है। आज ही हमारे भूतनाथ भगवान शंकर अपने गणों से आपके संबंध में उपदेश दे रहे थे। जैसा कि आप कहा करते हैं कि, ‘“जो भी व्यक्ति जिस भावना से जिस देवता को पूजता है. वह उस देवता के लोकों के फलाफल को प्राप्त करता है। जो शिष्य अपने सद्गुरु (अर्थात् जो गुरु पम्परा में निर्गुण निराकार परमब्रह्म, परम परमात्मा, सत्पुरुष को भजता है) का पूजा अर्चना करते हुए उसके बताए अनुसार अनुसरण करता है, वह मोक्ष को प्राप्त होता है। "

"जिसको भोग की आकांक्षा शेष रहती है, वह इसी मानव लोक या देवी, देवता के लोक में या देवत्व पद को प्राप्त करता है। जैसे गांधी एवं नहुष इन्द्र पद को प्राप्त हुए। गांधी तनय विश्वमित्र अभी वर्तमान के ब्रह्मा हैं। इनके बाद ब्रह्मा - पद पर वशिष्ठ बैठने वाले हैं। इसी तरह विष्णु एवं शंकर का भी पद है। क्या यह आपकी उक्ति है न ?"

हां भैरव जी ठीक कहते हैं। परंतु मेरी वाणी उन तक कैसे पहुंच गई। स्वामी जी सबकी वाणी सभी जगह मौजूद है। मात्र देखने सुनने की क्षमता होनी चाहिए। हम लोगों का वार्तालाप भी सर्वत्र पहुंच रहा है। सभी देवता सुन रहे हैं। मैं देख रहा हूं। कारण शरीर की क्षमता अनन्त है। आत्म शरीर एवं ब्रह्म शरीर की क्षमता का क्या कहना है। आपकी शंका भी मात्र तभी तक है, जब तक आप इस शरीर में हैं। इस शरीर से निकलते ही आपकी शंकाएं निर्मूल हो जाएंगी।

ठीक कहते हो भैरव जी साधकों की साधना कभी निष्फल नहीं जाती है। यदि साधक संयोगवश समय के सद्गुरु के साथ लग गया तो फिर क्या उसके साधना में चार चांद लग जाता है। साधक विशिष्ट ब्रह्म या निर्विशेष ब्रह्म को प्राप्त कर, साधना के अनुरूप कल्पित भोगों को भोगता है। वही ईश्वर होकर जीवों को कर्मों का फल देता है। मुमुक्षुओं को मुक्त करता है। जो पुरुष शोक, मोह आदि अष्ट दोषों और षट् उर्मियों का त्याग करके निर्गुण ब्रह्म की अटूट उपासना करता है। उसकी मोक्ष प्रदान करता है। जो विशेष रूप गुरु ब्रह्म की आराधना करता है। उसको परम्परा करके मोक्ष कराता है। जो गुरु रूप का ध्यान करते-करते निर्गुण निराकार को प्राप्त कर लेता है। वह गुरु अनुकंपा में स्नान कर चुका है, उसको साक्षात मोक्ष कराता है। जो विभिन्न देवताओं के रूप से उपासना करते हैं। उनको उस देवता का लोक, स्वर्गादि की प्राप्ति होती है। उनकी उपासना के अनुसार सायुज्य, सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य लोकों को प्राप्त करता है। परंतु देवता भी सदा भयभीत रहते हैं कि जैसे ही उनके भोग की पुण्यों की अवधि के क्षीण होने पर नष्ट हो जाते हैं। अतएव देवलोक में किसी को सुख नहीं होता है। इन्द्रादि देवता को निम्नतम योनियों को प्राप्त हो जाते हैं। इसमें संदेह नहीं है।

देखो भैरव जी ! इस संसार में देव लोक की कामना से व्यक्ति विभिन्न देवताओं की भक्ति करते हैं। चूंकि संसार से देवलोक अच्छा है, श्रेष्ठ है। स्वर्ग की कामना सभी करते हैं। परंतु जब ब्रह्मा उत्पन्न हुए तब वे भी अपने को अकेला देखकर डरे । फिर वे तपस्या और ज्ञान के द्वारा शान्ति को प्राप्त हुए। जब हिरण्यगर्भ में बहुत होने (एमोहं बहुश्यामि) की इच्छा हुई तब उसका मन बाहर जाकर फैल गया और घबराने लगा। मन यहीं से बर्हिमुख हुआ तथा इसमें अब अनेक प्रकार की कामनाएं उठने लगी। यह दुःखी होने लगा। तब हिरण्यगर्भ ने अपने मन को अंदर बुलाया और समझाया- घबराओ मत। तुम जैसा कहोगे मैं वैसा ही करूंगा। तब से मन प्रसन्न एवं अप्रसन्नता के मध्य घूम रहा है। वह दुःख-सुख के चक्र में फंस गया है। सुख की कामना से देवताओं की उपासना करने लगता है। देवताओं के आशीर्वाद से यह इतना बर्हिमुख हो जाता है कि आत्म तत्व, ब्रह्म तत्व को भूलकर शरीर एवं इन्द्रियों को ही सत्य मानकर उसके उपभोग में लग जाता है। फिर वह राक्षस बन जाता है। फिर वह देवताओं के लोक को, सुख को बलात शक्ति से हस्तगत कर लेना चाहता है। सृष्टि में उत्पात शुरू हो जाता है। उधर देवता भी भयभीत रहते हैं। जहां भय है, वहां सुख-शान्ति कैसे होगी ?

देव विशेष स्वरूप में सुख शान्ति नहीं है। विवेकी जन निर्विशेष स्वरूप की इच्छा करते हैं। निर्विशेष में दुःख लेशमात्र भी नहीं है। अक्रिय, अभय, अविनाशी परमब्रह्म ही सत् है। आपका देवलोक एवं यह संसार भयवान, क्रियावान, नाशवान, परिच्छिन्न होने से ब्रह्म के सापेक्ष्य में ही सत्य है। अन्यथा ब्रह्म भाव हटते ही असत् एवं नाशवान है।

क्रमशः.....