साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति रहस्यमय लोक से

प्रदीप नायक प्रदेशअध्यक्ष सदगुरु कबीर सेना छत्तीसगढ़

साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति रहस्यमय लोक से

"द्रोण की व्यथा"


  मोहजनित व्यक्ति जिंदा प्रेत है। संत तुलसीदास जी कहते हैं "मोह सकल व्याधि कर मूला ।"सभी रोगों का जड़ मोह ही है। वह मोह किसी को किसी के प्रति हो सकता है। एक जन्म का मोह हजारो जन्मों, हजारों वर्षों तक भटका देता है। यह मोह साधारण व्यक्ति को छोटा होता है। पढ़े-लिखे विद्वान, प्रवचनी को ज्यादा होता है। साधारण किसान को अपनी खेती बाड़ी, गाय, बकरी तक ही सीमित है। परंतु विद्वान, राजा, चतुर पराक्रमी को ज्यादा होता है। रावण का मोह था की संपूर्ण पृथ्वी का एकछत्र, मानवी रहस्य भोगूं। पृथ्वी का जो भी सुंदर है, कीमती है, वह हमारे भाग्य की वस्तु है। हमारे बाद हमारा पुत्र उस भोग का उत्तराधिकारी हो। भोग की सीमा अनंत है। महिषासुर, वृषासुर, भस्मासुर अर्थात ये सारे असुर अद्भुत विद्वान, पराक्रमी, धन-संपत्ति पूर्ण ऐश्वर्यशाली हुए हैं। परंतु इनका मोह ही इन्हें राक्षस बना दिया है। जब किसी व्यक्ति का मोह किसी पदार्थ, किसी भोग, किसी तृष्णा के प्रति शेष रहता है, इस बीच उसका शरीर छोड़ने के लिए बाध्य किया जाता है, तब वह प्रेत योनि को प्राप्त होता है। यह आम धारणा है की युद्ध में मारा गया व्यक्ति स्वर्ग को जाता है। यह बिल्कुल सत्य नहीं है। कुछ अंश तक सत्य है। जो सैनिक पूर्ण त्याग से, अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त करता है। वह निश्चित रूप से स्वर्ग प्राप्त करता है। जो सैनिक अनिच्छा से, किसी दबाव में युद्ध में जाता है। उसका मन घर, गृहस्थी, पत्नी, पुत्र के मोह से ग्रसित रहता है, वह यदि युद्ध में मारा गया तो प्रेत योनि में लाया जाता है। जहां उसे दुख ही दुख है। जो विद्वान पुरुष, बहादुरी पूर्वक किसी समर्थ शक्तिशाली व्यक्ति, अवतार से किसी खास उद्देश्य से लड़ता है, वह उसी को प्राप्त होता है। जैसे रावण---वह जानता था कि हमारा शरीर भजन नहीं कर सकता है। मेरे हठयोग से मेरी मृत्यु भी नहीं होगी। मैं देवता-दानव से अजेय हूं। परंतु मोह से परास्त था। फिर भी उसे मन में मोह के प्रति विद्रोह भी था। अतएव वह राम को अपने घर निमंत्रित किया। वह युद्ध भूमि में राम से युद्ध करते हुए मारा गया। अंतिम वाक्य उसके मुंह से निकला, "कहां राम रण हतौ प्रचारी।" राम शब्द के साथ प्राण छोड़ दिया। वह रामाकार हो गया।
     एक ऐसे वीर पुरुष है। जो पुरुषों में प्रसिद्ध है। जिससे मिलने पर मेरे ही पैरों के नीचे की धरती खिसक गई। मेरे अपने काम ही पराए हो गए। क्या यह सत्य है? या कोई और है जो प्रेत योनि में भी आकर झूठ का सहारा ले रहा है? फिर क्या किसी अवतार, भगवान, सद्गुरु के सामने भी प्राण छोड़कर प्रेत योनि में जा सकता है? ये सारे प्रश्न मेरे सामने पूर्व की भांति नवीन है। जो हो यह सत्य भी हो सकता है। असत्य भी। आप स्वयं अपने सत्यासत्य के तराजू में तौल कर परखें।
    पूर्णिमा का चांद पूर्ण क्षितिज पर फैल रहा था। सर्वत्र शांति-प्रकाश था। मैं अपने कक्ष में विश्राम कर रहा था। एकाएक मेरी नींद खुल गई। हमारा कक्ष स्वर्णमयी प्रकाश से प्रकाशित था। यह क्या? मैं तो लाइट ऑफ करके ही सोता हूं। घड़ी बगल में ही रखने की आदत है। देखा, बारह बचकर दस मिनट हो रहा था। मैं सोचा मेरी नींद तो 3:00 बजे भंग होती है। तभी झरोखे से अति सुंदर प्रकाश की रोशनी आते हुए नजर आई। उस प्रकाश में शब्द भी था। स्वामी जी, मुझ पर दया करें। मैं लगभग पांच हजार दो सौ वर्ष से भटक रहा हूं। मेरी पीड़ा-कष्ट बढ़ते जा रहे हैं। मेरी रक्षा करो।
     मैं तुरंत सिद्धासन पर योग मुद्रा में बैठ गया। अपने गुरु का ध्यान किया फिर आंख बंद कर पूछा---यह क्या? अंदर से आवाज आई---"देखो, हमने प्रत्यक्ष है। बातें करो। डरने की कोई बात नहीं है। सभी अपने किए का फल भोगता है। इनका पुत्र हमसे हस्तिनापुर के युद्ध में अश्व के साथ मिला था। यह तुमसे मिल रहे हैं। यह मानव शरीर अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी शरीर से किसी भी शरीरी का उद्धार किया जा सकता है। अर्थात उच्चतम आत्माएं भी किसी का उद्धार इसी शरीर के माध्यम से करती है। इस शरीर के लिए दोनों रास्ते खुले हैं---चाहे तुम नरक के द्वार में प्रवेश करो। चाहे स्वर्ग के द्वार में, चाहे दोनों से ऊपर सद्गुरु अर्थात सतलोक में चले जाओ। तुम्हें यह अति कीमती शरीर एवं समय दोनों उपलब्ध हैं। इसका प्रयोग तुम्हारे ऊपर निर्भर है। यह महानुभाव महाभारत काल से ही भटक गए हैं। कल से आज तक पूरी सृष्टि ही बदल गई है। आप इन्हीं सुनो।"
     मैं शान्तचित्त बैठ गया। आंखें खोल दो। सामने गौर वर्ण पुरुष खड़े थे। दाढ़ी श्वेत थी। वस्त्र भी श्वेत था। काले रंग का दुपट्टा डाल रखे थे। माथे पर स्वर्ण मुकुट---गले में, हाथ में स्वर्ण आभूषण था। बगल में तलवार लटक रही थी। चेहरे पर गहरा दुख, विषाद दिखाई पड़ रहा था। जो अपनी व्यथा को वर्षों से छिपाए जा रहे थे। परंतु अब वे छिपाने में असमर्थ नजर आ रहे थे। मैंने सोचा ये कौन है----राजपुरुष?


    स्वामी जी! मैं हूं द्रोण! मेरे मुंह से अनायास निकला---क्या महाभारत के पात्र--द्रोणाचार्य? यह कैसे संभव है?
     सभी कुछ संभव है। इस दृष्टि में कुछ भी असंभव नहीं है। जो व्यक्ति वर्तमान को नहीं पहचानता, आलस-प्रमाद वश उसे गवा देता है। उसे युगो युगो तक पश्चाताप करना पड़ता है। हाथ लगती है---तड़पन, उत्पीड़न तथा दुख।
      स्वामी जी! आप मेरे जन्म के संबंध में जानते हैं। कोई भी अपने पुत्र को नहीं फेंकना चाहता है। जब व्यक्ति संसार के झूठी प्रतिष्ठा के चक्कर में पड़ जाता है तब अपने किए कर्मों की तरफ से मुख मोड़ना चाहता है। वह उसे छुपाना चाहता है। जितना ही छिपाने की कोशिश करता है---वह उतना ही प्रकट होता जाता है। उसकी प्रगति कर उसके पूरे भविष्य को समाप्त कर देता है। कुंती लोक-लज्जा वश कर्ण से अपने को बचाना चाही। परंतु वह बच नहीं सकी। संभवत उसे पहले ही प्रकट कर दी होती। शायद महाभारत जैसा युद्ध नहीं होता। भगवान कृष्ण को युद्ध भूमि में खड़ा नहीं होना पड़ता। वे गीता को प्रेम से गाते। बांसुरी के तान पर गाते। हम सभी उस गीता को सुनने के लिए बाध्य होते। पृथ्वी कृष्ण की होती। सभी शौर्य, बहादुर पृथ्वी के नवनिर्माण में लग जाते। जो हमारी उर्जा विध्वंस में लगी। वह निर्माण में लगी होती तो; पृथ्वी पर ही स्वर्ग होता। कुंती ने कर्ण को छिपाने का दुस्साहस किया किंतु छिपा नहीं सकी। कर्ण  भयंकर विस्फोट के साथ प्रकट हो गया। मुझे छुपाया गया, कृपा, कृपी, द्रोणी को छिपाया गया। कोई नहीं छिपा। सभी आणविक बम की तरह विस्फोटक हो गया। जिसका परिणाम आज की पृथ्वी है।

क्रमशः....