रायपुर में माइक्रोबस सेवा को 96% यात्रियों का समर्थन

रायपुर में माइक्रोबस सेवा को 96% यात्रियों का समर्थन

रायपुर में 45 दिनों तक चले माइक्रोबस पायलट प्रोजेक्ट में सर्वे में शामिल 96 प्रतिशत यात्रियों ने दैनिक आवागमन के लिए माइक्रोबस सेवा का समर्थन किया। सीईईडब्ल्यू (काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर) के अध्ययन के अनुसार, छोटी और वातानुकूलित बसें संकरी सड़कों वाले छोटे और मध्यम शहरों में सार्वजनिक परिवहन की कमी दूर करने में उपयोगी हो सकती हैं। अध्ययन को 19वें अर्बन मोबिलिटी इंडिया सम्मेलन में केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री तोखन साहू ने जारी किया।

छत्तीसगढ़ सरकार के सहयोग और आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के मार्गदर्शन में संचालित इस पायलट प्रोजेक्ट में जून-जुलाई 2026 के दौरान रायपुर के दो प्रमुख मार्गों पर 17 से 22 सीटों वाली आठ एसी माइक्रोबसों का संचालन किया गया। अध्ययन में यात्रियों की प्रतिक्रिया, यात्रा खर्च और वाहनों की उपयोगिता का आकलन किया गया।

45 दिनों में 18,682 यात्री यात्राएं दर्ज
पायलट प्रोजेक्ट के तहत माइक्रोबसों का संचालन सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे तक किया गया। ये बसें रायपुर जंक्शन से आईएसबीटी भाठागांव और रायपुर जंक्शन से टाटीबंध के बीच चलीं।

इस दौरान माइक्रोबसों में कुल 18,682 यात्री यात्राएं दर्ज की गईं। प्रतिदिन औसतन 480 यात्रियों ने सफर किया, जबकि एक दिन में सर्वाधिक 722 यात्रियों ने इन सेवाओं का उपयोग किया।

बसों से यात्रा करने वाले 500 यात्रियों के सर्वे में 53 प्रतिशत कामकाजी लोग थे। इनमें से कई यात्री सप्ताह में लगभग चार बार सफर करते थे और प्रत्येक यात्रा में 4 से 12 किलोमीटर की दूरी तय करते थे।

ऑटो और दोपहिया छोड़कर माइक्रोबस से सफर
अध्ययन के मुताबिक, माइक्रोबस सेवा का इस्तेमाल करने वाले 63.7 प्रतिशत यात्री ऑटो और ई-रिक्शा से आए, जबकि 14 प्रतिशत ने दोपहिया वाहनों के बजाय माइक्रोबस को चुना।

यात्रियों को आकर्षित करने वाले प्रमुख कारणों में कम किराया, एसी सुविधा और सुरक्षा शामिल रहे। सर्वे में 78 प्रतिशत यात्रियों ने कम किराये, 74 प्रतिशत ने वातानुकूलन और आराम तथा 55 प्रतिशत ने सुरक्षा को माइक्रोबस चुनने की वजह बताया।

माइक्रोबस से यात्रा करने वाले यात्रियों का औसत यात्रा खर्च उनकी पारिवारिक आय के मुकाबले 6.9 प्रतिशत से घटकर 3.1 प्रतिशत रह गया। सबसे कम आय वाले परिवारों के लिए यह अनुपात 13.9 प्रतिशत से घटकर 6.6 प्रतिशत दर्ज किया गया।

माइक्रोबस की डिजाइन में बदलाव की जरूरत
सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में माइक्रोबस के आकार और श्रेणी को स्टेज-कैरिज यानी निर्धारित मार्ग पर यात्रियों को चढ़ाने-उतारने वाली सार्वजनिक परिवहन सेवा के लिए उपयुक्त पाया गया। हालांकि, यात्रियों और चालक दल ने मौजूदा मॉडलों की डिजाइन में बदलाव की जरूरत बताई।

सुझावों में बस के बीच खड़े होने की जगह चौड़ी करना, सामान रखने की व्यवस्था करना और पैरों के लिए अधिक जगह उपलब्ध कराना शामिल है।

सीईईडब्ल्यू की फेलो हिमानी जैन ने कहा कि भारतीय शहरों में भीड़भाड़, वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन का विस्तार जरूरी है। उनके मुताबिक, माइक्रोबस संकरी सड़कों वाले पुराने शहरी इलाकों में किफायती सेवा देने के साथ मेट्रो की फीडर सेवा और आसपास के उपनगरीय क्षेत्रों को जोड़ने में भी उपयोगी हो सकती हैं।

छोटे और मध्यम शहरों में बड़ी मांग की संभावना
अध्ययन के अनुसार, भारत में 2031 तक लगभग 4,200 वैधानिक शहर होने का अनुमान है। देश के करीब 95 प्रतिशत शहर छोटे और मध्यम आकार के हैं, जिनकी आबादी 20 हजार से 3 लाख के बीच है। इनमें से कई शहरों में बड़ी बसों के संचालन के लिए पर्याप्त यात्री मांग नहीं है या सड़कें संकरी हैं।

सीईईडब्ल्यू के एक अन्य अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि 2031 तक भारतीय शहरों को लगभग 6.5 लाख माइक्रोबसों की जरूरत हो सकती है। इनमें से 77 प्रतिशत मांग छोटे और मध्यम आकार के शहरों से आने का अनुमान है।

अध्ययन में दिए गए प्रमुख सुझाव
सीईईडब्ल्यू ने शहरों में सड़क की चौड़ाई और यात्रियों की मांग के आधार पर बसों का आकार तय करने की सिफारिश की है। पायलट के आंकड़ों के अनुसार, समान मांग की स्थिति में 17 सीटों वाले वाहन में सीट ऑक्यूपेंसी 80 प्रतिशत तक रही, जबकि नौ मीटर लंबी बस में यह 42 प्रतिशत थी।

अध्ययन में अलग-अलग तकनीक और ईंधन वाले वाहनों का परीक्षण करने पर भी जोर दिया गया है। रायपुर के पायलट में केवल दो डीजल मॉडल परखे गए थे, जबकि इलेक्ट्रिक माइक्रोबस के व्यावसायिक विकल्प उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई है।

इसके अलावा, माइक्रोबसों को बड़े पैमाने पर सार्वजनिक परिवहन में शामिल करने के लिए मानक वाहन विशिष्टताओं, संचालन संबंधी मानक प्रक्रियाओं (SOP), मॉडल अनुबंधों और पीएम-ईबस सेवा जैसी राष्ट्रीय योजना की जरूरत बताई गई है।

अध्ययन का निष्कर्ष है कि स्थानीय सड़कों और यात्रियों की जरूरत के अनुरूप वाहन चुनकर माइक्रोबसों को छोटे और मध्यम शहरों की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का हिस्सा बनाया जा सकता है।