त्रिदिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ

तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर शासकीय नवीन महाविद्यालय, अमलीडीह के आदरणीय प्राचार्य डॉ. तपेश चंद्र गुप्ता ने अपने स्वागत भाषण में सभी प्रतिभागियों का अभिनंदन करते हुए शोध की सूक्ष्म बारीकियों से अवगत कराया तथा शोध में आ रही नवीन तकनीकों के समुचित उपयोग द्वारा अपने शोध को और अधिक सशक्त बनाने पर बल दिया।

त्रिदिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ

" शोध पद्धति – अवधारणा, उपकरण एवं अनुप्रयोग (Research Methodology: Concepts, Tools and Applications)" विषय पर नवीन शासकीय महाविद्यालय के तत्वावधान में दिनांक 03 नवम्बर 2026 से त्रिदिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का आयोजन संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के सभागार में किया जा रहा है।
प्रथम दिवस के उद्घाटन सत्र में संगोष्ठी के प्रथम दिवस, दिनांक 03 नवम्बर 2026 को प्रातः 11:00 बजे उद्घाटन सत्र का शुभारंभ हुआ।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में परम आदरणीय प्रो.. जी. के. देशमुख, डीन एवं डायरेक्टर, प्रबंधन विभाग, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर ने अपने व्याख्यान में शोध के क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव, उससे उत्पन्न होने वाली चुनौतियों तथा उपलब्ध अवसरों पर सरल एवं प्रभावशाली ढंग से प्रकाश डाला। उन्होंने शोध कार्य में AI के सकारात्मक एवं नैतिक उपयोग की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही, शोध में साहित्यिक चोरी (Plagiarism), मौलिकता एवं शोध की गुणवत्ता से संबंधित महत्वपूर्ण पहलुओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उन्होंने शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों को तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए शोध की प्रामाणिकता एवं मौलिकता बनाए रखने के लिए जागरूक किया।

विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. अभया जोगलेकर, प्राचार्य, शासकीय बद्रीप्रसाद लोधी कला,वाणिज्य और विज्ञान  स्नातकोत्तर महाविद्यालय आरंग  ने अपने उद्बोधन में महाविद्यालय के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि शोध केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के प्रत्येक पहलू से जुड़ा हुआ है। शोध के माध्यम से नए विचारों, विकल्पों एवं संभावनाओं की खोज की जाती है। उन्होंने प्रतिभागियों को नई तकनीकों, नवीन विचारों एवं आधुनिक शोध उपकरणों का उपयोग करके अपने शोध कार्य को अधिक प्रभावी, गुणवत्तापूर्ण एवं उपयोगी बनाने के लिए प्रेरित किया। उनके अनुसार, नए विकल्पों की खोज करना और समस्याओं के समाधान के लिए नए दृष्टिकोण विकसित करना ही वास्तविक शोध है।

विशिष्ट अतिथि डॉ. सुनीता दुबे, शोध मार्गदर्शक, शासकीय चोइथराम कॉलेज धरसींवा  ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि एक शोधकर्ता एवं शिक्षक जीवनभर सीखने की प्रक्रिया से जुड़ा रहता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी से कुछ न कुछ सीखता है। वर्तमान राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी इसका जीवंत उदाहरण है, जहाँ विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान, शिक्षक एवं शोधार्थी अपने अनुभवों, विचारों और ज्ञान का आदान-प्रदान कर रहे हैं। इस प्रकार के शैक्षणिक आयोजन शोध की गुणवत्ता बढ़ाने तथा अकादमिक सहयोग को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं
राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का द्वितीय सत्र:
नवीन शासकीय महाविद्यालय के तत्वावधान में आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी के प्रथम दिवस के द्वितीय सत्र में शोध की अवधारणा, आवश्यकता, समस्या चयन, आंकड़ा संकलन एवं शोध पद्धति के विभिन्न पहलुओं पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई।

सत्र के दौरान डॉ उषाकिरण अग्रवाल,प्राचार्य,शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय ,देवेंद्र नगर ने बताया कि शोध (Research) केवल किसी विषय का अध्ययन करना नहीं है, बल्कि किसी समस्या के समाधान, नवीन तथ्यों की खोज तथा उपलब्ध ज्ञान में नए आयाम जोड़ने की एक व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक प्रक्रिया है। शोध प्रारंभ करने से पूर्व शोधार्थी को यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह शोध क्यों करना चाहता है और उसके शोध का उद्देश्य क्या है।

उन्होंने कहा कि शोध का संबंध केवल विज्ञान या चिकित्सा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि मेडिकल, इंजीनियरिंग, सामाजिक विज्ञान, मानव संसाधन प्रबंधन (HR Department), विधि (Law), बीमा (Insurance), वित्तीय प्रबंधन सहित विभिन्न क्षेत्रों में शोध की व्यापक संभावनाएँ हैं। प्रत्येक क्षेत्र में नवीन ज्ञान के सृजन एवं व्यावहारिक समस्याओं के समाधान के लिए शोध की आवश्यकता होती है।

सत्र में शोध समस्या (Research Problem) के चयन को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया। वक्ता ने कहा कि शोध की शुरुआत जिज्ञासा एवं उत्सुकता से होती है। किसी सामान्य घटना के पीछे छिपे कारणों को जानने की इच्छा ही शोध की आधारशिला है। उदाहरण के लिए, 'सेब नीचे ही क्यों गिरता है?' जैसे सामान्य प्रश्न से भी वैज्ञानिक खोज की शुरुआत हो सकती है। इसी प्रकार खेल, अवसाद (Depression) तथा व्यक्तित्व में होने वाले परिवर्तनों जैसे विषयों पर भी शोध किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि एक अच्छी शोध समस्या व्यावहारिक, स्पष्ट, सरल, शोधार्थी के अध्ययन क्षेत्र से संबंधित तथा पर्याप्त साहित्य एवं ज्ञान पर आधारित होनी चाहिए। शोध में विभिन्न चरों (Variables) के बीच संबंधों की पहचान एवं विश्लेषण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आगे शोध की संरचना एवं प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि शोध में सैद्धांतिक आधार (Theory), प्रतिचयन रणनीति (Sampling Strategy), शोध विधियाँ (Research Methods) तथा आंकड़ा संकलन (Data Collection) महत्वपूर्ण घटक हैं। पीएच.डी. शोध कार्य में नवीन ज्ञान, मौलिकता एवं स्थापित ज्ञान में सार्थक योगदान प्रस्तुत करना आवश्यक होता है।

सत्र में प्रतिचयन (Sampling) की अवधारणा तथा शोध पद्धति (Research Methodology) के महत्व को भी समझाया गया। साथ ही, गुणात्मक (Qualitative) एवं मात्रात्मक (Quantitative) शोध दृष्टिकोणों के माध्यम से शोध विषय का व्यवस्थित अध्ययन करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

अंत में वक्ता ने प्रतिभागियों को प्रेरित करते हुए कहा कि सफल शोध के लिए सही समस्या का चयन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, उपयुक्त शोध विधियों तथा व्यवस्थित आंकड़ा संकलन का विशेष महत्व है। इस सत्र से उपस्थित शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को शोध की मूलभूत अवधारणाओं तथा व्यावहारिक पक्षों की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई।


संगोष्ठी के तृतीय सत्र में विभन्न विषयों की शोध में तकनीक,विश्लेषण आदि में अंतर पर विभिन विषय विशेषज्ञों द्वारा  बात की गई। विभिन्न विषय विशेषज्ञों में सर्वप्रथम वरिष्ठ साहित्यकार डॉ चितरंजन कर ने कहा की बिंदु में सिंधु और सिंधु में बिंदु ही शोध है ।उन्होंने  विभिन्न विषयों की शोध को आपस में जोड़ते हुए कहा कि अलग-अलग विषयों की शोध अलग ना होकर एक ही होती है।नैतिकता और ईमानदारी शोध में बहुत आवश्यक है। गृह विज्ञान विषय की विशेषज्ञ द्वय डॉक्टर नंदा गुरुवारा, प्राचार्य डॉ राधाबाई शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय रायपुर एवं डॉ अभ्या जोगलेकर प्राचार्य शासकीय बद्री प्रसाद लोधी कला,वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय आरंग ने बोलते हुए कहा कि गृह विज्ञान की शोध पांच क्षेत्रों में की जा सकती है और बदलते परिपेक्ष में जब स्वस्थ शरीर व जीवन शैली पर जोर दिया जा रहा है तो इस विषय की शोध की उपादेयता और बढ़ जाती है । पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कंप्यूटर विभाग के प्राध्यापक डॉ वी के पटले ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान में ए आई के बढ़ते हुए अनुप्रयोग से शोध में बहुत बदलाव आया है पर इसका विवेकपूर्ण प्रयोग ज़रूरी है। विधि क्षेत्र की विशेषज्ञ डॉ विनीता अग्रवाल ने कहा कि हम विधि की शोध के द्वारा समाज की सेवा करते हैं और शोध करते समय हमें छोटा नमूना लेना चाहिए ताकि बेहतर ढंग से अध्ययन किया जा सके।इतिहास की वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ मोना जैन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा की शोध परंपरा लोक परंपरा पर आधारित रही है प्राचीन काल के सिक्कों अभिलेख और गुफा के शिलालेखों से काफी जानकारी प्राप्त हुई है इतिहास में शोध में डेटिंग मेथड का प्रयोग किया जाता है .अर्थशास्त्र विषय के वरिष्ठ प्राध्यापक और डीन फैकेल्टी आफ सोशल साइंसेज ,पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय डॉ रविंद्र ब्रह्म ने अपनी बात रखते हुए कहा कि अर्थशास्त्र  विषय की शोध गुणात्मक और मात्रात्मक  दो प्रकार की हो सकती है और अध्ययन की पद्धति, समंक संकलन की विधि और विश्लेषण की विधि इस पर निर्भर करती है कि विषय क्या है ।वर्तमान परिपेक्ष में और  बदलते हुए वैश्विक स्वरूप के अनुसार अनगिनत क्षेत्र में अर्थशास्त्र विषय में शोध किया जा सकता है जैसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार, अर्थव्यवस्था से संबंधित विभिन्न क्षेत्र और आर्थिक नीतियां आदि। भौतिक शास्त्र विभाग के वरिष्ठ अध्यापक पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय श्री के यादव जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए  कहां कि कंप्यूटर विभाग में मशीन लर्निंग साइबर सिक्योरिटी और वास्तविक जीवन की व्यवहारिक शोध आदि पर बोल दिया जाना चाहिए उन्होंने शोध उपकरणों और स्वास्थ्य देखभाल में विभिन्न शोध प्रविधियां का के प्रयोग पर भी बातचीत की डॉ राधाबाई शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय की पूर्व प्राचार्य डॉ प्रीति मिश्रा ने समाजशास्त्र में शोध किए जाने के संबंध में यह कहा कि शोध की नैतिकता बनी रहनी चाहिए। इस प्रकार त्रि दिवसीय  राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी के प्रथम दिवस पर वैचारिक मंथन के द्वारा विभिन्न विषयों पर शोध संबंधी विचार विमर्श के सत्र रहे  जिसमें शोधार्थियों में  शोध संबंधी आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के तरीके और नैतिकता पर अपने विचार रखा।