साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति रहस्यमय लोक से

प्रदीप नायक प्रदेश अध्यक्ष सदगुरु कबीर सेना छत्तीसगढ़

साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति रहस्यमय लोक से

 आप सभी को मेरा कोटिश: नमन है। मेरा नमन आप स्वीकार करें। मैंने झुक कर सभी को प्रेम पूर्ण अभिवादन किया। सभी ने हाथ उठाकर आशीर्वाद दिए।
   मैं मंचासीन मां गंगा की तरफ देखा, उनके आंखों में आंसू था। दाहिना हाथ उठा कर मुझे आशीर्वाद दे रही थी। उनके हाथों से एक विचित्र प्रकार की रश्मि निकल रही थी। जो मेरे सिर पर पड़ रही थी। उनकी आंखों से भी सजल प्रकाश निकल रहा था। जो मेरे त्रिकुटी पर पड़ रहा था। मैं अपलक त्राटक मुद्रा में अपनी ही मां को देख रहा था। प्रकाश रूपी दुग्ध पान कर रहा था। पता नहीं कितनी देर तक इस स्थिति में रहा।
     एकाएक प्रणव ध्वनि से ध्यान दूसरे तरफ आकर्षित किया। राजा-रानी देवोदासजी, मां गौरी, भगवान परशुराम सभी आशीर्वाद मुद्रा में अपना हाथ उठाएं थे। मैं नतमस्तक हो गया। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सभी की पवित्र ऊर्जा, पराक्रम, तप, श्री, उनसे प्रकाश के विभिन्न रूपों में निकल कर मुझ में प्रवेश कर रही थी। मैं उसी प्रकाश में अंदर-बाहर भीग रहा था। शरीर हल्का होते जा रहा था। मेरा आसन जमीन से पांच फुट ऊपर उठ गया था। पुनः एक ध्वनि गुंजन करने लगी। मैं सामने देवता, सामने गणपति, रिद्धि सिद्धि, सूर्यादि देवगण खड़े हैं। वे भी अपना आशीर्वाद मौन-त्राटक मुद्रा में हाथ उठाकर दे रहे हैं।


     मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि विभिन्न तरफ से बेहाल दौड़े आ रहे हैं एवं बिना गर्जन किए एक छोटे से पुष्कर में बरस रहे हैं। जो कुछ दूर है, वे भी दूर से ही प्रकाश रूपी वर्षा को मेरे पुष्कर रूपी तीर्थ में फेंक रहे हैं। संभवत: यही मौका है, कोई भी मौका झुकना नहीं चाहता है।
      जिधर देखता, उधर से देवगण मुझे देने को आतुर प्रतीत हो रहे हैं, क्या संत गण इसलिए कहे कि "सुपात्र"बनो। यही तुम्हारे हाथ में है। सुपात्र बनते ही ऊर्जा सर्वत्र से दौड़ने लगती है। जैसे होड़ लग गई है। मेरे आंख, कान, नाक, मुंह, ब्रह्म रंध्र सभी खुले हैं। शरीर का प्रत्येक कण खुला है। पारदर्शी है। जो अंदर है, वह दृष्टिगोचर हो रहा है। जो बाहर से ऊर्जाएं प्रवेश कर रही है, वह भी दृश्य है। सभी कुछ दृश्य है। यहीं सभी कुछ संभव है। असंभव विदा हो गया है।
      यह अवस्था अवर्णनीय है। इसलिए अविश्वसनीय भी हो सकती है। अतार्किक भी संभव है। परंतु सुह्रदय, सुपात्र, श्रद्धा वान के लिए गुरु अनुकंपा से इस जगत में कुछ भी असंभव नहीं है।


       मैं बहुत काल तक इसी स्थिति में रहा। सुना था गुरु गागर में सागर भर देता है। वह स्वयं में दृश्य मान था। अहो भाव से भरा था। कृतज्ञता से पूर्ण था। यह विचित्र समाधि थी। जिसमें सभी कुछ ज्ञेय था। अज्ञेय था संसार।
       एक चिर- परिचित शंख ध्वनि सुनाई पड़ी। उसमें माधुर्य था। प्रणव का गुंजन था। अज्ञात शक्ति की तरफ आकर्षण का निमंत्रण था। वह ध्वनि धीरे-धीरे तेज होने लगी। ऐसा प्रतीत होता था कि वह समीप आ रही हो। सभी की जैसे समाधि टूटी हो। सभी लोग जैसे एक समाधि रूपी पुष्कर्णी में, मानसरोवर में गोता लगा रहे हो। सभी "स्व"भूल गए हैं। सभी का "स्व"मिलकर एक विराट "परमात्म" रुपए उर्जा में विलीन हो गया है। ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे सभी एक ही विराट परम पुरुष रूपी वृक्ष की डालियां है। सभी उससे आबध्द है। सभी की जड़ एक ही है। सभी का पोषणकर्ता एक ही है।


      यह संसार हमारे ही ऊपर पत्तियों के तरह आच्छादित हैं। क्या यही है वैश्वानर? क्या यही है विराट विश्वरूप?

क्रमशः.....