सुप्रीम कोर्ट में बंगाल SIR पर सुनवाई, ममता बनर्जी ने खुद रखा पक्ष
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इस दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं अदालत में मौजूद रहीं और वकीलों के बीच बैठकर कार्यवाही पर नजर रखी। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने की।
सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत में राज्य सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए केवल चार दिन शेष हैं, जबकि स्थिति बेहद गंभीर है। उनके मुताबिक, करीब 32 लाख मतदाता सूचीबद्ध नहीं हो पाए हैं, 1.36 करोड़ नाम “तार्किक विसंगति सूची” में हैं और 63 लाख मामलों की सुनवाई अब भी लंबित है।
अदालत में उठे प्रक्रिया पर सवाल
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उन्हें पश्चिम बंगाल के अपने साथी न्यायाधीशों से मतदाता सत्यापन और प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को लेकर जानकारी मिली है। इसी आधार पर अदालत ने इस मुद्दे को सुनवाई में शामिल किया है। अदालत को यह भी बताया गया कि विसंगति सूची ही सूचना का एकमात्र माध्यम नहीं है और संबंधित लोगों को व्यक्तिगत नोटिस भी भेजे जा रहे हैं।
वहीं, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वकीलों के बीच नामों के उच्चारण को लेकर हल्की नोकझोंक भी देखने को मिली। इस दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी हस्तक्षेप किया, जिससे सुनवाई और चर्चा में आ गई।
ममता बनर्जी का आरोप— SIR का इस्तेमाल नाम हटाने के लिए
सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वयं अदालत में आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया का उपयोग बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि शादी के बाद उपनाम बदलने वाली महिलाओं, फ्लैट खरीदने वाले गरीब लोगों और स्थान परिवर्तन करने वालों के नाम एकतरफा तरीके से काटे जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि बंगाल को चुनकर निशाना बनाया जा रहा है, जबकि अन्य राज्यों में निवास प्रमाण पत्र, आधार और जाति प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज स्वीकार किए जाते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा शासित राज्यों से नियुक्त किए गए “सूक्ष्म पर्यवेक्षक” बिना उचित सत्यापन के नाम काट रहे हैं।
चुनाव आयोग पर तीखे आरोप
ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को “व्हाट्सएप आयोग” तक कह दिया और आरोप लगाया कि आयोग व्हाट्सएप के जरिए अनौपचारिक आदेश जारी कर रहा है। उन्होंने कहा कि फसल कटाई और यात्रा के मौसम में इतनी जल्दबाजी समझ से परे है। मुख्यमंत्री ने दावा किया कि 58 लाख नाम काटे गए और लोगों को अपील का मौका तक नहीं दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और अगली सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले में व्यावहारिक समाधान निकाला जा सकता है। अदालत ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार सोमवार तक उन अधिकारियों की सूची पेश करे, जिन्हें उपलब्ध कराया जा सकता है। साथ ही, चुनाव आयोग को भी संवेदनशीलता बरतने और अनावश्यक नोटिस न जारी करने की सलाह दी गई।
अदालत ने दोनों याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए SIR से जुड़े सभी मामलों की अगली सुनवाई 9 फरवरी को तय की है। सुनवाई के अंत में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पीठ का आभार जताया और लोकतंत्र व नागरिक अधिकारों की रक्षा की अपील की।
गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने अपनी याचिका में चुनाव आयोग द्वारा जून और अक्टूबर 2025 में जारी SIR से जुड़े सभी आदेशों को रद्द करने की मांग की है। उनका कहना है कि 2002 की आधारभूत सूची पर आधारित यह प्रक्रिया और जटिल सत्यापन प्रणाली वास्तविक मतदाताओं के मतदान अधिकारों के लिए खतरा बन रही है।