रेरा के आदेश कागजों तक सीमित? सुपर बिल्ट-अप पर रोक के बावजूद जारी रजिस्ट्रियां
रियल एस्टेट क्षेत्र में कार्पेट एरिया बनाम सुपर बिल्ट-अप एरिया का विवाद एक बार फिर चर्चा में है। रेरा अधिनियम 2016 की धारा 2(के) में सुपर बिल्ट-अप एरिया का उल्लेख नहीं है और बिक्री कार्पेट एरिया के आधार पर किए जाने का प्रावधान है। इसके बावजूद प्रदेश में कई बिल्डर सुपर बिल्ट-अप के आधार पर ही फ्लैट बेच रहे हैं और रजिस्ट्रियां भी उसी हिसाब से हो रही हैं।
रेरा ने 11 अक्टूबर 2024 और 30 अप्रैल 2025 को इस संबंध में आदेश जारी किए। 30 अप्रैल 2025 के आदेश में स्पष्ट लिखा गया कि रेरा अधिनियम में सुपर बिल्ट-अप एरिया का कोई प्रावधान नहीं है और रजिस्ट्री कार्पेट एरिया के आधार पर की जानी चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया कि विज्ञापनों और ब्रोशर में केवल कार्पेट एरिया का उल्लेख हो।
हालांकि आदेश में यह भी जोड़ा गया कि प्रमोटर बालकनी, सीढ़ी, कॉरिडोर या ओपन एरिया का अलग से उल्लेख कर सकते हैं। जानकारों का कहना है कि इसी बिंदु का सहारा लेकर बिल्डर सुपर बिल्ट-अप की अवधारणा को अप्रत्यक्ष रूप से जारी रखे हुए हैं। जमीनी स्तर पर न तो व्यापक जांच हुई और न ही रजिस्ट्रार कार्यालयों से यह जानकारी मांगी गई कि वास्तविक रजिस्ट्रियां किस आधार पर हो रही हैं।
क्या है कार्पेट और सुपर बिल्ट-अप एरिया?
कार्पेट एरिया वह वास्तविक क्षेत्र होता है, जिसका उपयोग घर के भीतर किया जाता है, जैसे कमरे, रसोई और बाथरूम। वहीं सीढ़ियां, लिफ्ट, कॉरिडोर और साझा हिस्से सुपर बिल्ट-अप में जोड़े जाते हैं। कई मामलों में 30 से 40 प्रतिशत तक क्षेत्र सुपर बिल्ट-अप में जोड़ दिया जाता है, जिससे उपभोक्ता को कम उपयोगी जगह के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है।
विशेषज्ञों का तर्क है कि बहुमंजिला इमारत में सीढ़ी या लिफ्ट आवश्यक हिस्सा है, लेकिन उसका अलग से मूल्य जोड़ना उपभोक्ता के लिए बोझ बन जाता है। प्रचार सामग्री में बड़े अक्षरों में सुपर बिल्ट-अप एरिया दिखाया जाता है, जबकि कार्पेट एरिया अपेक्षाकृत कम होता है। इससे खरीदार भ्रमित हो जाते हैं।
रेरा कानून के अनुसार एग्रीमेंट और रजिस्ट्री दस्तावेज में कार्पेट एरिया का स्पष्ट उल्लेख अनिवार्य है। यदि सुपर बिल्ट-अप के आधार पर रजिस्ट्री की जाती है तो इसे कानून का उल्लंघन माना जाएगा और संबंधित राज्य रेरा में शिकायत की जा सकती है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि आदेश जारी होने के बावजूद निगरानी और कार्रवाई का अभाव क्यों है। उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि यदि सख्त जांच और दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो आदेश महज औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।