ख्वाब

मंजू शर्मा दिल्ली

ख्वाब

आसमां से उतरकर ओस की ये बूंदे
लगता है इश्क के बैठी पत्तों से
या पिघलता कोई ख्वाब है
तबाह होंगी सूरज की तपिश में

या ख्वाहिशों के नाजुक मोती है
हवाओं की मेहरबानी से फ़ना होगीं मिट्टी में
या पानी के बुलबुले हैं
बह गए तो हाथ धों बैठेगी अपनी शख्सियत से

खुद से ज्यादा किसी और का होना 
कब गलत हुआ इश्क में दो का एक हो जाना .
संसारी विपत्तियों से टकराकर भी
लोग बेशक जुदा हुए इश्क सदा रहता है
इश्कबाजों के दिल मे बहता है.......