साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति शिव तंत्र से

प्रदीप नायक प्रदेश अध्यक्ष सदगुरु कबीर सेना छत्तीसगढ़

साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति शिव तंत्र से

रावण का भाई-बहनों के साथ तप करना

माल्यवान समय-समय पर एकान्त कानन में इन भाइयों एवं बहनों को अपनी सभ्यता और संस्कृति के विषय में बताता। रक्ष संस्कृति कैसे विनष्ट हुई इसमें किन-किन देवगणों का हाथ है। यह पूरी जानकारी अपने भावी भविष्य के लिए अपने भावी कर्णधारों को देता। यह भी कहता बेटे रावण तुम सब भाई, बहन मिलकर अपनी संस्कृति को किसी तरह बचा लो यह मेरी इच्छा है। तुम्हारी माँ को नहीं चाहते हुए भी इस बूढ़े देवर्षि से विवाह कराकर रक्त सम्बन्ध स्थापित किया। अब तुम्हारे ही हाथ में रक्ष संस्कृति धरोहर के रूप में सुरक्षित है। चाहो तो अपनी बुद्धि, प्रतिभा एवं देवज्ञ ज्ञान का सहारा लेकर अपनी खोयी विरासत वापस ले सकते हो परन्तु बेटे तुझे कुछ चालाकी का सहारा लेकर अभी देवेन्द्र को मिलाये रखना होगा। देवेन्द्र सहित समग्र देवता को मिलाये रखना होगा। रक्ष संस्कृति के अग्रगण्य सदाशिव की प्रसन्नता के लिए तुम्हें तप करना होगा। तब कहीं तुम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हो। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में तुम्हारे सब भाई-बहन तुम्हारी सहायता करेंगे। अतएव समय नहीं है। तप करो उससे शक्ति मिलेगी। वह शक्ति तुम्हें समग्रता की तरफ ले जायेगी। अभी तुझे अपने पिता या देवगण के किसी भी प्रपंच, लोभ, लालच में नहीं पड़ना है। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तथाकथित सुखों का त्याग करना होगा। अन्यथा बीच में भटक जाओगे लक्ष्य तो 
दूर, भटकाव ही हाथ लगेगा। 'ये सारी बातें अत्यन्त गोपनीय रहनी चाहिये। लक्ष्य की प्राप्ति परम कर्तव्य

होना चाहिये। इस प्राप्ति के लिए कुछ भी कार्य उचित होगा। यही मेरी अभिलाषा है। जिसकी उम्मीद में अभी तक जिन्दा हूँ। रावण ने अपने भाइयों की तरफ देखते हुए पूछा- क्यों भाइयों। तुम लोगों की क्या इच्छा है? कुम्भकर्ण तुरन्त बोल उठा, प्रिय एवं पूज्य भ्राताश्री आप जो भी करेंगे हम आपके साथ हैं। हर स्थिति में, हर क्षण में तुम्हारी रक्षा में रहेंगे। हमें किसी भी तरह का लोभ लालच नहीं है। बस आपकी सेवा में मेरे प्राण चले भी जाते हैं तो मैं अपना सौभाग्य समजूँगा। बहन स्वर्णरेखा भी मधुर प्रिय वाणी में बोली- पूज्य भ्राताश्री। मैं यह जानती हूँ कि आप हमारी संस्कृति को बचाने में कामयाब रहेंगे। मैं आपकी संस्कृति की रक्षक एवं प्रचारक रहूँगी। मैं तो नारी हूँ। मेरी रक्षा तो आपके ऊपर है ही। चूँकि मैं एकमात्र आपकी प्रिय बहन जो ठहरी। विभीषण मौन थे। काफी कुछ खोदने पर अपनी मौनता भंग किये। काफी सोच-समझकर बोले - "रक्ष संस्कृति के रक्षार्थ आपके साथ रहूँगा या रक्षार्थ जो भी करना होगा मैं करूँगा।" रावण भाई-बहनों का उत्तर सुनकर प्रसन्न था। मन-ही-मन झूम उठा। सोचा जिसके इतने चतुर, पुरुषार्थी भाई-बहन हों, उसे कैसी चिंता ? आज नहीं तो कल हम लोग अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ही लेंगे। अतएव इसकी पूर्व योजना अभी से बनानी होगी। देखो, यह सौभाग्य है कि हम लोगों के पिता महान् देवर्षि हैं। पितामह पुलस्त्य हैं, जिसके यहाँ सभी देवतागण सादर आते हैं। हम लोगों पर विशेष अनुग्रही भी हैं। अतएव अपने व्यवहार एवं माता की तरह शिष्ट सेवा से सभी देवगणों का आशीर्वाद प्राप्त करना ही श्रेयस्कर होगा। अतएव आप सभी सेवा करके आशीर्वाद ग्रहण करें। यही हमारा निर्देशन है। मैं भी इनकी सेवा में तत्पर हूँ। कुछ काल के बाद शिव के समीप जाकर तंत्र की साधना करूँगा। जिससे हम लोगों का कल्याण सम्भव है। इस तरह इन्होंने अपनी सेवा परायणता से सब देवताओं को प्रसन्न कर लिया। सभी देवताओं ने यथायोग्य अपने आप आशीर्वाद दिया। सभी भाई-बहन आशीर्वाद पाकर धन्य हो गये। पिता एवं पितामह की विशेष कृपा थी ही। रावण चतुरतापूर्वक देव एवं देवर्षि से धनुर्विद्या वगैरह भी हासिल करने में समर्थ हो गया। विभिन्न प्रकार की विद्या, कला का प्रशिक्षण अपने नाना के द्वारा भी प्राप्त किया। इस प्रकार वह रक्ष संस्कृति एवं देव संस्कृति दोनों की युद्ध कला एवं संस्कृति को समझने में समर्थ हो सका। इतना विद्यावान-शिष्ट होने पर भी देवगण इसे कहीं का उत्तराधिकार नहीं देना चाहते थे बल्कि हेय दृष्टि से देखते थे। इसे वे लोग देव संस्कृति में लेने पर कतई तैयार नहीं थे। धीरे-धीरे उपेक्षापूर्ण जीवन-यापन करने को बाध्य होने लगे। रावण ने इस समय अत्यन्त चतुरता से काम लिया एवं सभी भाइयों को पिता के गृह में ही रह कर तप करने एवं शक्ति अर्जन करने को कहा। स्वयं कैलाश जाकर सदाशिव से तंत्र सीखने का मन बना लिया। कुछ काल के उपरान्त वह शिव के चरणों में पहुंच ही गया। सदाशिव ने उसे तंत्र के साथ-साथ अस्त्र-शस्त्र की विद्या भी प्रदान की तथा रक्ष संस्कृति को बचाने हेतु आशीर्वाद भी प्रदान किया। रावण अजन विद्या, बल, बुद्धि की प्रवीणता ग्रहण कर, अपने पिताश्री के गृह पहुँचा जिसे देखकर सब भाई-बहन, माँ, पिता अत्यन्त प्रसन्न हुए। पिताश्री ने उसके विवेक को देखकर दीर्घजीवी का आशीर्वाद भी दे दिया। रावण ने प्रपिता ब्रह्मा का भी आशीर्वाद प्राप्त किया। अजय, अमर का वरदान प्राप्त किया। ब्रह्मा ने उसे अपना ब्रह्मास्त्र भी प्रदान किया।

रावण का लंका पहुंचना

रावण अब अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु योजना बनाने लगा। इस योजना में अपने भाइयों एवं नाना को सम्मिलित किया। पूरा सोच-विचार कर नाना का आशीर्वाद प्राप्त कर सीधे लंका पहुँचा। वहाँ लंका नगर को घूमकर देखा। जिसकी शोभा तो अवर्णनीय सुन्दर एवं सर्वसाधन सम्पन्न थी। यह भी देखा कि आयुद्ध के सब सामान तो हैं परन्तु उनका संचालन करने वाला कोई भी नजर नहीं आता। सभी देवगण वहाँ भोग में लिप्त थे। कौन आ रहा है? कौन जा रहा है? किसी को कुछ पता नहीं। मानो सभी भोग वृत्ति से ही आये हों। सभी लिप्त थे। रावण में यह देख साहस का संचार हुआ। वह सोचने लगा कि इसे (लंका) तो सहज ही ग्रहण किया जा सकता है। यहाँ तो कोई युद्ध करने वाला है ही नहीं। यहाँ युद्ध की जरूरत हो नहीं। सभी भोग-वृत्ति में हैं, अतएव यह सुअवसर देख रावण अपने भाइयों के साथ पहुँच गये सीधे कुबेर के भवन में। वहाँ भी कोई रोक-टोक नहीं। रावण अपने भाई कुबेर के मुख्यालय में बैठ गये। कुम्भकर्ण को सेना मुख्यालय में, स्वर्णरखा को संचार मुख्यालय एवं विभीषण को गृह मंत्रालय के मुख्यालय में भेज दिया। तब स्वर्णरेखा ने आकाशवाणी से सन्देश प्रसारित करा दिया कि आप सभी बन्दी हैं। आप जो जहाँ हैं, वहीं रुके रहें। भागने की जरूरत नहीं। आज से यहाँ के राजा हुए महाराज रावण। सेना, गृह मंत्रालय सभी हमारे कब्जे में आ गया है। कुबेर बन्दी बना लिये गये हैं। आप सभी देवगण जैसे हैं वैसे रहें। आप के लिए कोई आपत्ति नहीं। हाँ सवेरे होते ही नगर प्रमुखगण महाराज रावण के स्वागत में खाली हाथ दरबार हाल पहुँचे। कोई भी देवगण किसी भी तरह का छल किया, तो सेना प्रमुख कुम्भकरण के द्वारा मौत के घाट उतार दिया जायेगा। कोई भी किसी तरह का अपशब्द या अपमानमूलक वचन का प्रयोग करेगा, तो गृह प्रमुख विभीषण के द्वारा बंदी बना लिया जाएगा। संचार व्यवस्था, संचार-प्रमुख स्वर्णरखा के हाथ में है। जहाँ से यह सन्देश आप लोगों को दिया जा रहा है। आप सभी सुबह होते ही महाराज रावण के नेतृत्व में राज-काज करने का प्रमाण पेश करें। आप सभी से यही उम्मीद है। महाराज रावण राजगद्दी पर बैठे हैं। राज्य का सूत्रधार बन गये हैं। उन्हीं के आदेश पर चप्पे-चप्पे में सेना खड़ी है। अतएव आप सभी का मंगलमय भविष्य इसी में है कि शीघ्र ही उनकी अधीनता स्वीकार कर राज्य संचालन में मदद करें। इस प्रकार प्रसारण आकाशवाणी से बार-बार दिया जाने लगा।

सभी देवगण अचानक यह प्रसारण सुनकर सन्न रह गये। उनका होश ही उड़ गया। सभी देवेन्द्र-देवेन्द्र चिल्लाने लगे। दूसरा प्रसारण सुनने का इन्तजार करते परन्तु सदैव एक ही व्यक्ति के द्वारा प्रसारण सुनकर उन्हें सत्यभाषित होने लगा कि कुबेर बन्दी बना लिए गये हैं। सारी सेना घेर ली गयी है। गृह मंत्रालय भी घेर लिया गया है। सभी रक्षक समेत अधिकारी जो जहाँ था वहीं किंकर्तव्यविमूढ़-सा हो गया। जो स्वप्न में सोचा नहीं जा सकता वही हो गया। आखिर हुआ कैसे यह ? कोई किसी से नहीं मिलता। सभी अपने-अपने घरों में छिपे हैं कर्तव्यहीन हो गये हैं। ये सोचने को मजबूर हो गये हैं कि अच्छा है हमें क्या अन्तर पड़ता है? कल तक कुबेर हमारे राजा थे। आज रावण हमारे राजा हैं। हमें कौन-सा राजा बनना है? इत्यादि बातें सोचने लगे। कोई भय से एक-दूसरे से बात नहीं करता। भय से यह सन्देश देवेन्द्र के यहाँ भी नहीं भेजते। सभी रात्रि भर में हथियार डालने एवं प्रात:काल महाराज रावण का अधिनायकत्व स्वीकार करने को तैयार हो जाते हैं। सभी उनकी सेवा में बढ़-चढ़ कर स्तुति गान करने की सोचने लगते हैं। सभी सोचते हैं मैं पहले उनके राज्यारोहण की बधाई दूँ जिससे हमारा सम्बन्ध एवं भविष्य अच्छा रहेगा

रावण की राजनीति एवं कूटनीति

सुबह होते ही सेना के शीर्षस्थ अधिकारी दिग्पाल से लेकर वरुण, अग्नि, मरूत, नारदीय व्यवस्था, सूर्य, शनि सभी विभाग के प्रधान देवताओं में रावण के पास पहुँचने की होड़ सी लग गयी। सभी एकान्त में महाराज रावण से मिलते एवं उनका गुणगान करते तथा कुबेर के शासन व्यवस्था की शिकायत। महाराज यह कोई व्यवस्था है। यहाँ न कोई नियम, न कानून, न ही विधि, न ही व्यवस्था। सभी भोगवादी है। ठीक किया आप आ गये। आपको पहले ही आना चाहिये था। अच्छा हुआ, देर से हुआ परन्तु ठीक हो गया। अब आप जैसे कहेंगे हम लोग करेंगे।
नीतिपूर्वक काम करने में ही मन लगता है। यहाँ तो केवल देवेन्द्र की चापलूसी एवं छल, झूठ के सिवाय कुछ है ही नहीं। यह भी कोई व्यवस्था है। खैर जो हुआ सो ठीक हुआ। महाराज रावण की जय। इस प्रकार सभी जय-जयकार करते आते एवं सभी को महाराज रावण उचित निर्देश देकर वापस कर देते। यह सिलसिला दिनभर चलता रहता। महाराज रावण ने सन्ध्या में फिर सन्देश प्रसारित कराया कि सभी अपने-अपने घर के अन्दर रहें। अगले निर्देश का इन्तजार करें। जो कोई भी आदेश का उल्लंघन करेगा उसे दण्ड दिया जायेगा। इस तरह एक सप्ताह तक देवगण अपने-अपने गृह में बने रहे। विभागाध्यक्ष को समयानुसार बुलाया जाता एवं निर्देश देकर वापस कर दिया जाता। रात्रि के एकान्त में सभी भाई एवं नाना मिलते एवं आगे की नीति निर्धारित करते। इसी बीच एक नियम बनाया गया जो सबको समान

रूप से लागू करने एवं मानने को कह दिया गया। (1) सभी अपनी क्षमता के अनुसार काम करेंगे। आवश्यकता के अनुसार उन्हें आवश्यक सामान मिलेगा।

(2) देव प्रदत्त हिंसक यज्ञ अब यहाँ नहीं होगा।

(3) भोग प्रधान लंका नहीं रहेगी।

(4) कर्म प्रधान लंका होगी अतएव कर्म करना सभी को अनिवार्य है।

(5) सभी को शिव के तंत्र को मानना एवं करना होगा।

(6) कोई झूठा अनर्गल प्रलाप नहीं करेगा।

(7) देवेन्द्र की कोई व्यवस्था यहाँ मान्य नहीं होगी।

(8) आम जनता को अपनी शिकायत करने का एवं न्याय पाने का हक होगा।

(१) कोई छोटा कोई बड़ा नहीं होगा।

(10) योग्यता के अनुसार काम का बँटवारा होगा।

(11) कोई किसी भी तरह का कार्य करने से बड़ा-छोटा नहीं होगा।

(12) उसकी प्रतिष्ठा उसके, कर्मठता एवं ईमानदारी पर निर्भर करेगी।

(13) चरित्र से समझौता नहीं किया जायेगा।

(14) किसी भी देवता की झूठी बढ़ाई (स्तुति) नहीं की जायेगी।

(15) किसी को भोग की वस्तु आवश्यकता से अधिक संग्रह करने का अधिकार नहीं होगा।

(16) सभी निर्भय, सर्वत्र विचरण करेंगे।

(17) किसी भी प्रकार का दोष पाये जाने पर किसी भी देवता को कड़ा-से-कड़ा दण्ड दिया जायेगा।

(18) अकारण कोई किसी को नहीं डरायेगा या कष्ट पहुँचायेगा। चाहे वह शनि 
ही क्यों न हो। समय पड़ने पर उन्हें भी दण्ड भोगना होगा। 19) विद्या सभी के लिए समान रूप से पढ़ने का अधिकार होगा।

( (20) सभी की खुशहाली ही राष्ट्र का धर्म होगा।

(21) अपनी सभ्यता संस्कृति को फैलाना भी हमारा उद्देश्य होगा।

महाराज रावण के द्वारा उपर्युक्त नियमों का आकाशवाणी के द्वारा बार-बार -प्रसारण कर दिया गया तथा सभी को नियमबद्ध रहने का आदेश दिया गया। उस नियम से राज्य की आम जनता जहाँ बहुत ही प्रभावित हुई, वहीं देवगण अप्रसन्न हुए। इसके बाद महाराज रावण का विधिवत् राज्यारोहण किया गया। राज्यारोहण के समय लंका के देवतागणों एवं आस-पास के देवर्षिगणों ने स्तुति गान किया। राज्य की गतिविधियाँ सुचारू रूप से चल निकलीं। राज्य का इस प्रकार संचालन देख कुबेर घबरा गये तथा लंका से जाने की इच्छा व्यक्त की। महाराज रावण ने सहर्ष कुबेर को ससम्मान विदा कर दिया। देवेन्द्र को यह जानकर पहले अत्यन्त कष्ट हुआ परन्तु पुलस्त्य एवं विश्रवा के समझाने पर देवेन्द्र ने अपनी सहमति प्रदान कर दी कि रावण को देव संस्कृति के अनुरूप ही रहना होगा। महाराज रावण ने अपने को मजबूत करने के लिए देवर्षि को समुचित स्थान दिया। निर्विघ्न रूप से महाराज रावण नियमानुसार लंका का राज्य संचालन करने लगे। इसी अवधि में अपनी एवं भाईयों की रक्ष संस्कृति के अनुसार शादी-विवाह किया।

महाराज रावण का प्रभुत्व एवं पराक्रम ज्यों-ज्यों बढ़ता गया त्यों-त्यों ही राज्य का विस्तार भी होने लगा। इस तरह से विस्तारवादी होते गये। इस विस्तार के माध्यम से वे अपनी संस्कृति को फैलाने लगे। जब वे समझ गये कि लंका अब सशक्त, समृद्ध राष्ट्र हो गया, तब वे देव संस्कृति के द्वारा हिंसक एवं घृणित यज्ञों को बन्द करने लगे। अपनी तंत्र विद्याओं का प्रचार करने लगे तथा इसके लिए अलग-अलग तंत्र केन्द्र भी स्थापित करने लगे। यहाँ का पहला तंत्र केन्द्र हर साधन से उपलब्ध, सुरम्य, ध्यान के लिए उपयुक्त, मानसिक रूप से स्वस्थ्य, आध्यात्मिक रूप से उत्कृष्ट अशोक वाटिका को बनाया गया। कहा जाता है कि उस अशोक वाटिका में देवदुर्लभ, मानव दुर्लभ, यक्ष दुर्लभ वृक्ष लगाये गये। यहाँ तंत्र के आविष्कार की नई-नई विधाएँ स्थापित की गई। उस वाटिका की ख्याति कुछ दिन में इतनी फैल गई कि दूर-दूर से लोग अपने शोक भुलाने के लिए आने लगे। कहा जाता है कि अशोक वाटिका ऐसी थी कि वहाँ किसी प्रकार का शोक नहीं था। यानी प्रसन्नचित्त होकर उस परमपिता परमात्मा की साधना करना ही यहाँ के तान्त्रिकों का लक्ष्य हो गया। कालान्तर में यही अशोक वाटिका तंत्र का मुख्यालय बनी तथा इसकी शाखा किष्किंधा पंचवटी, त्रिकूट, प्रयागराज एवं बक्सर (सिद्धाश्रम)  में स्थापित की गई। इस तंत्र के केन्द्रों (रक्ष संस्कृति के आश्रमों) के द्वारा रह संस्कृति का प्रचार-प्रसार भारत के भू-भाग पर होने लगा। देवर्षि लोग इससे चिन्तित एवं भयभीत हुए। परन्तु महर्षि (मानव ऋषि) अत्यन्त प्रसन्न हुए चूंकि उन्हें भी यज्ञों के माध्यम से हिंसा करना तथा चरित्र से समझौता करना अच्छा नहीं लग रहा था। इस तरह महाराज रावण का संस्कृति के साथ-साथ सभ्यता का भी विकास अग्रगति से चरमोत्कर्ष तक पहुँचने लगा। बाद में महाराज रावण इन्हीं स्थानों के माध्यम से सुयोग्य व्यक्तियों के द्वारा अपने शासन को भी व्यवस्थित करने लगे। इस शासन व्यवस्था में ज्यादा-से-ज्यादा अपने रिश्तेदार एवं सम्बन्धियों को रखा। चूँकि आप जैसा जानते हैं कि लंका में पहले देवराष्ट्र ही स्थापित था। इसलिए वहाँ की जनता एवं देवोत्पन्न लोग ही वहां रहते थे। रक्ष संस्कृति में बहुत कम लोग बच गये थे। इसलिए यह स्वाभाविक होता है कि अपने सगे-सम्बन्धियों को उच्च पदों पर लगाया जाये।

जैसा कि आप लोग भी देखते हैं कि इन्हीं प्रमुख स्थानों पर मानव ऋषि भी रहते थे या कहा जाये कि मानव ऋषियों का तंत्र साधना का केन्द्र यहीं था तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऐसा मालूम होता है कि रक्ष संस्कृति एवं मानव संस्कृति के ऋषिगण अन्वेषण का कार्य करते थे। चूँकि विश्वमित्र से लेकर भारद्वाज, अत्रि तक तथा निषाद से लेकर शबरी एवं नल, नील तक सभी महाराज रावण के हो कार्य क्षेत्र में आते हैं। ऐसा कहीं उदाहरण नहीं मिलता है कि महाराज रावण के द्वारा किसी की भी हत्या की गयी हो। सारे के सारे ऋषि इन्हीं क्षेत्रों में रहते थे। यदि उन्हें किसी भी प्रकार का कष्ट होता तो ये सहज ही इन स्थानों का परित्याग कर सकते थे। प्राप्त ग्रन्थों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि इन आश्रमों की दूरी पर हड्डियों का अम्बार मिलता था, ऐसा सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वे हड्डियाँ देव संस्कृति या देवर्षि के द्वारा किये गये पशुबलि का परिणाम रही होंगी। दोनों की मिली-जुली संस्कृति से नये युग का सूत्रपात हुआ। सबके लिए समान रूप से विद्या का द्वार खोल दिया गया। सबके लिए तंत्र का द्वार खोल दिया गया। बहुत अल्पकाल में ही महाराज रावण की जय-जयकार दसों दिशाओं में होने लगी। इनकी

ख्याति को देखकर देवगणों की जलन स्वाभाविक थी। देवेन्द्र अत्यन्त चिन्तित हो जाते हैं। इसे अप्रत्याशित घटना समझने लगते हैं तथा

महाराज रावण से मिलने के लिए उपाय सोचने लगते हैं। पुलस्त्य, अगस्त्य, वशिष्ठ आदि देवर्षियों को आमन्त्रित किया गया तथा देवेन्द्र ने अपने प्रमुख सभासदों को बुलाया। सबके समक्ष महाराज रावण की लोकप्रियता एवं जनप्रतिष्ठा अहम् प्रश्न बनकर खड़ी थी। सब लोगों ने सर्वसम्मति से उसे मिलाकर ही रखने का सुझाव दिया तथा देवलोक में आमन्त्रित कर पूर्ण प्रतिष्ठित कर सम्मान देने का भी प्रस्ताव पास हुआ। चूंकि सबों ने यह स्वीकार किया कि महाराज रावण पुत्र तो है देवर्षि का ही न। इसलिए हमारे गुणों से आज नहीं तो कल परिचित तो होना ही पड़ेगा।

महाराज रावण को ससम्मान स्वर्ग में बुलाया गया। उन्हें देवर्षि राजा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। स्वर्ग के सब देवता महाराज रावण की सेवा में लग गये। यह प्रमाण मिलता है कि सारे देवता एवं देवियाँ उनकी सेवा में सदैव लगे रहते थे। जैसे-जैसे देवगण महाराज रावण के समीप आते गये, वे वैसे-वैसे मानव संस्कृति से दूर होते गये। रावण एवं देवगण में इतनी घनिष्टता बढ़ गयी कि रावण राज्य के सभी लोग देवलोक में ही रहना पसन्द करने लगे। वे लोग इतना तक सोचने लगे कि कोई सीधा मार्ग वहाँ तक बना दिया जाये जिससे आम जनता वहाँ आसानी से आ-जा सके। परन्तु लंका एवं हिमालय स्थित स्वर्ग (रूस-चीन) देवेन्द्र की राजधानी त्रिविष्टप (तिब्बत) में काफी लम्बी दूरी थी एवं रास्ता दुरूह था जो सरल नहीं बन सका। वे लोग पुष्पक विमान से ही आ-जा सकते थे। रावण की यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी कि स्वर्ग सबके लिए सहज उपलब्ध हो सके।

रावण का विज्ञान अब देव संस्कृति के सम्बन्ध से और आगे बढ़ने लगा। समय एवं स्थान के अनुरूप बादल का वर्षा देना। हवा के द्वारा ही घर की सफाई होना। इच्छानुसार ही अग्नि का कार्य करना। सभी लक्ष्मी से परिपूर्ण सभी खुशहाल । यह सभी विज्ञान की उन्नति एवं विकास का ही परिणाम था। लंकाधिपति देव संस्कृति के समीप आने लगे जिससे उनकी प्रजा भी सहज स्वाभाविक रूप से आकृष्ट होने लगी। इस तरह लंका देव संस्कृति को धीरे-धीरे आत्मसात करने लगी। चूँकि प्रजा पहले से देवगण ही थी, जब कुबेर अधिपति थे। इन भाई-बहनों में भी पिता के द्वारा प्रदत्त खून देव का ही था। अतएव उनकी तरफ आकर्षित होना सहज स्वाभाविक हो गया। यह समय उनके नाना के मरने के बाद का था। अब उनके ऊपर कोई सम्यक अंकुश नहीं रह गया था। धन, पद-प्रतिष्ठा प्राप्त करने पर बुद्धि सहज ही अधोगति की तरफ उन्मुख होती है। महाराज रावण अपनी रक्ष-संस्कृति से हटने लगे। जिसके इन्तजार में देवगण थे। जबकि एक समय ऐसा आया कि रावण स्वर्ग के देवगण, अप्सराओं के साथ लंका में ही निवास करने लगे। अब अप्सराओं का नाच-गाना, आमोद-प्रमोद शुरू हो गया। अब सभी लोग अपने कर्म-धर्म से हटने लगे। भोग में प्रवृत्ति होने लगी। जो मानव मन की सहज प्रवृत्ति है। महाराज रावण का सम्पूर्ण खानदान अधोपतन की तरफ उन्मुख होने लगा। अब देवगण एवं देवर्षि की मंत्रणा के अनुसार कार्य भी सम्पादन होने लगा। जिसका परिणाम था (मानव) ऋषियों से विचार की भिन्नता। यह विचार भिन्नता धीरे-धीरे उग्रता का रूप लेने लगी एवं विरोध उत्पन्न होने लगा। इधर देवेन्द्र मानव ऋषि, राजर्षि एवं राजा को मिलाने के लिए सोमयज्ञ स्थापित करने लगे। जिसमें उन्हें सफलता भी मिली। अभी हम इसे यहीं छोड़ें। आगे इस पर पुन: विचार किया जायेगा।

क्रमशः....