साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति रहस्यमय लोक से

प्रदीप नायक प्रदेश अध्यक्ष सदगुरु कबीर सेना छत्तीसगढ़

साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति रहस्यमय लोक से

भगवान कृष्ण से बढ़कर गुरुभक्त खोजना पृथ्वी पर दुष्कर है। अर्जुन प्रतिदिन हमसे आशीर्वाद ग्रहण करता। मैं बरबस देता था। में विपक्ष से लड़ता रहा फिर भी अर्जुन मेरे हत्या से पीछे हट गया। वह हार स्वीकार कर सकता था परंतु गुरुहंता नहीं बन सकता था। जबकि सद्गुरु कृष्ण उसके साथ थे। उनकी आजा मानना उसका परम कर्तव्य था। मेरा पुत्र भी उनके खानदान का अन्तिम निशानी उनके पांचों पुत्रों को सोए हुए अवस्था में ही मार दिया। अश्वत्थामा का पशु की तरह बांधकर लाया था। कृष्ण ने आदेश दिया इस नराधम, आततायी को मार डालो। परंतु अति दुखी द्रौपदी ने कहा नहीं कृष्ण नहीं, इसे छोड़ दो। इसकी आंखों से गुरु द्रोण दिखाई पड़ रहे हैं। अर्जुन, भीम, धर्मराज सभी ने उसे मुक्त कर दिया। कृष्ण स्वयं उसे दण्डित किए। वह सिर की पीड़ा से अभी भी व्याकुल है। वह यत्र-तत्र सर्वत्र घूमता है । प्रायश्चित्त करना चाहता है। अभी तक प्रायश्चित्त नहीं हो सका।

मैं युद्धभूमि में था। कृष्ण प्रचारित करा दिए कि अश्वत्थामा (मेरा पुत्र) मारा गया। जबकि मैं उसे अमर बना दिया था। मैं पुत्रमोह में ही प्राणत्याग कर सकता था। यह कृष्ण को विदित था। मैंने कह दिया कि ऐसा संभव नहीं है। फिर मैंने कहा कि हमारा ही शिष्य धर्मराज जिसके लिए तुम कृष्ण युद्ध लड़ रहे हो, मैं जानता हूं वह सत्यनिष्ठ है। वह कभी भी झूठ नहीं बोलेगा। यदि वह कह देगा कि मेरा पुत्र मारा गया तब मैं मान लूंगा। जबकि युद्धभूमि में सभी एक-दूसरे को मारने के लिए ही आए हैं। मैं पुत्रमोह से बुरी तरह ग्रसित था । यह सभी जानते थे।

धर्मराज सामने आए। उन्हें कृष्ण ने सिखाया था। परंतु वे झूठ नहीं बोलने के लिए वचनबद्ध थे। उस समय अश्वत्थामा नाम का हाथी मारा गया था। कृष्ण ने कहा यही कह दीजिए। हमारा काम हो जाएगा। धर्मराज ने मेरे सामने आकर श्रद्धा से मेरा नमन किया। मैं विजयी भव का आशीर्वाद भी दिया। वे बोले-गुरुदेव 'अश्वत्थामा मरो नरो वा कुंजरो" मरो के बाद कृष्ण ने पांचजन्य शंख फूंक दिया। आगे नहीं सुन सका। मैं पुत्रमोह से व्याकुल हो गया। जो युद्ध धर्म के विपरीत है। मैं स्वयं धर्मराज के पुत्र अभिमन्यु की हत्या धोखे से किया था। युद्ध छोड़कर रथ से उतरकर पुत्रशाक से व्याकुल हो गया। अस्त्र-शस्त्र एक तरफ गिर गया। कृष्ण ने अर्जुन को ललकारा कि हे अर्जुन! इनका सिर धड़ से अलग करने का यही अवसर है। यही तुम्हारे पुत्र का हत्यारा है। परंतु अर्जुन गुरु की भावना से ओत-प्रोत था। पुत्रशोक से गुजर रहा था। वह गुरुहत्या से मुकर गया। उसके बदले हार को स्वीकार करना श्रेष्ठ समझा। तब कालों के काल कृष्ण ने धृष्टद्युम्न का सहारा लिया, 'तुम्हारा क्या होगा धृष्टद्युम्न। तुम्हारा तो जन्म ही हुआ है द्रोण की हत्या के लिए। इस अवसर का फायदा उठाओ। धृष्टद्युम्न ही मुझ पुत्रमोही का सिर धड़ से अलग कर दिया।' मेरी मृत्युपुत्र मोह से हुई है। सामने भगवान कृष्ण खड़े हैं। धर्मराज दूर भाग गया है। मैं आंख खोलकर कृष्ण को देखने का साहस नहीं कर सका। पुत्रमोह का आवरण मेरी आंखों पर ऐसा पर्दा बनकर पड़ गया था। अतएव मैं प्रेत-योनि में चला आया। मेरा पुत्र भी प्रेतवत दुःख भोग रहा है। पिता- पुत्र समान दुःखी हैं।

आचार्य द्रोण को मेरा नमस्कार ! मेरा नमस्कार ग्रहण करें, आचार्यवर! द्रोणाचार्य दुःखी मन इधर-उधर देखते हैं। फिर बुझे हुए चेहरे से बोले - हे प्रभु! यही नमस्कार लेना मेरे लिए महंगा साबित हुआ। कृष्ण का नमस्कार मैंने लिया। धर्मराज एवं अर्जुन का नमस्कार मैंने लिया। मैं सदैव सोचता रहा कि जरूर में श्रेष्ठ हूं। तभी तो आदर, श्रद्धा एवं नमस्कार पा रहा हूं। मेरा 'मैं' पन संधनीभूत हो गया। मेरे सामने कृष्ण का नमस्कार धृष्टराष्ट्र लिये। पूरे जीवन कृष्ण को स्वीकार नहीं किए। वही हमारे राजा थे। अन्नदाता थे। राजा ही आदर्श होता है।

मेरे सामने भीष्म पितामह प्रथम द्रष्टया कृष्ण को पूर्णरूपेण समझ गए। उनके पौत्र थे— कृष्ण । परंतु उन्होंने भरी सभा में नमस्कार लौटा दिया। कृष्ण को अपने आलिंगन में भर लिये। अपने अश्रु से उनका शरीर नहला दिए। यज्ञ में पितामह की पद की पूजा संभव थी। परंतु वे अपनी प्रतिष्ठा कृष्ण पर छोड़ दी। उनकी भक्ति से कृष्ण के पैर की पूजा हुई। जिसे दुर्योधन को उचित नहीं लगा। विदुरजी कृष्ण के नमस्कारी को वापस कर दिए। विमुख युद्ध से भी भाग गए। मैं वह समय चूक गया। शकुनी कहता था कि मैं जुआ में धूर्त हूं। कृष्ण धूर्तराज हैं। उसकी उक्ति से हम लोग सहमत थे। चूंकि राजा का साला था । दुलारा था। उसकी सम्मति ही मानी जाती थी। राजा धृतराष्ट्र ने अग्नि में जलकर प्राण छोड़े। वे एवं उनकी पत्नी भी पुत्र मोह से ग्रसित थे। जाते-जाते भी कृष्ण को शापित किए। ये सभी घटनाएं हमारे सामने घटीं। इतनी लम्बी अवधि हमने काट ली। कष्ट में, पीड़ा में कि क्यों नहीं हम लोग कृष्ण के सामने हथियार डाल दिया। हमने तप किया। संसार से सभी कुछ प्राप्त किया। उत्तर मिला तप से ऋद्धि-सिद्धि, नाम, यश, संसार की हर वस्तु प्राप्य है। परंतु गोविंद नहीं। गोविंद तो गुरु अनुकंपा का फल है। यही हमारी चूक है।

  क्रमशः......