साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति रहस्यमय लोक से

प्रदीप नायक प्रदेश अध्यक्ष सदगुरु कबीर सेना छत्तीसगढ़

साभार सद्विप्र समाज सेवा एवं सदगुरु कबीर सेना के संस्थापक सद्गुरु स्वामी कृष्णानंद जी महाराज की अनमोल कृति रहस्यमय लोक से

????सभी ने कहा, स्वामीजी यह प्रस्ताव तो बहुत अच्छा है। लेकिन कार्यान्वित
कैसे होगा? मैंने कहा, आप सभी मेरे सुझाव को अपने लोकपति भगवान विष्णु
एवं महेश से दें। उनका मंतव्य लें। तब मैं कार्यान्वयन के विषय में उपाय करूंगा।

मैं उस दिन आराम किया दूसरे दिन पुनः सभा बैठी। धर्मराज ने कहा
स्वामीजी ! भगवान विष्णु ने कहा है कि स्वामीजी असाधारण प्रतिभा के धनी है।
उनमें विश्वमित्र का देवास्त्र, दिव्यास्त्र एवं सृजन शक्ति है। बुद्ध का ध्यान, कृष्ण
का युग परिवर्तन तथा सद्गुरु कबीर की परम चेतना, परमपुरुष का आशीर्वाद प्राप्त
है। कल आप लोगों की वार्ता हम लोग भी अपने लोक से देख रहे थे। सुन रहे थे।
आप बिना समय बर्बाद किए उक्ति ग्रहण कर उस नियम को लागू करें। जब
अंतरिक्ष स्वस्थ होगा तब पृथ्वी ठीक होगी। गंगोत्री का जन्म ठीक होगा तब ही
आगे ठीक की उम्मीद होगी। आगे के प्रदूषण को रोका जा सकता है।

मैंने कहा ये आत्माएं केवल भीड़ में बैठी अपना अपना दुख रो रही हैं। कुछ
अवसर पाते ही बदला लेना चाहती है। इन्हें सत्संग हेतु बुद्ध महावीर, हमारे
सद्गुरु स्वामी आत्मा दास-दाद दरिया, पलटू नानक, कबीर, ईसा मूसा, मुहम्मद
स्वामी राम कृष्ण परमहंस शंकराचार्य, निम्वाकाचार्य, रामानन्दाचार्य, मीरा, गर्गी,
मैत्रेयी, सुलभा, बासमती नाई इत्यादि महापुरुषों, गुरुओं की सहायता ली जा
सकती है। जिस तरह की आत्माएं हों उसी तरह अलग अलग वर्गीकरण किया
जाए। आप इतना ही करें। मैं सभी गुरुओं से संबंध स्थापित कर लेता हूं। उनमें
आपस में एक दूसरे के प्रति जरा भी राग द्वेष नहीं है। बल्कि इस कार्य के लिए वे
प्रसन्न होंगे।

कुछ काल रुक गया। सभी दिव्यात्माओं से उनके लोक में मिला। मैंने
अपनी बातें रखीं। लगभग सभी ने इस सुझाव पर प्रसन्नता व्यक्त की। सभी ने
कहा स्वामी जी हम लोग तो पृथ्वी पर जाकर उस समय की रूढ़ परम्परा को तोड़ा
समय, स्थान, व्यक्ति के अनुसार धर्म दिया। परंतु दुखद घटना है कि हम लोगों के
रहते समय भी परम्परावादी हमारा विरोध किये। हमारे आने के बाद फिर हमारी
वाणी को पुस्तक का रूप दिया गया। उसी को सर्वश्रेष्ठ मानकर पूजा प्रारम्भ हो गयी। दूसरे को हीनभावना से देखा जा रहा है। हम लोग जहां जहां गये, बैठे, वहां
वहां हमारे अनुयायी मंदिर बना रहे हैं। समय बदल गया। व्यक्ति बदल गया।
व्यक्ति के लिए ध्यान, साधना, पद्धति, गुरु भी बदलता है। लेकिन वे तो मानो रूढ़
होने के आदी हैं। हम लोगों को बहुत दुख होता है कि आप जैसे सद्गुरु जाकर
अपनी बात रखते हैं परंतु वे हमारी ही पुस्तकों, वाणियों हमारी आकृतियों को श्रेष्ठ
मानते हैं। उसमें परिवर्तन नहीं चाहते हैं। यही मान्यताएं रूढ़ हैं। जो सत्य के दर्शन
से व्यक्ति को दूर रखता है।

हम लोग इन आत्माओं को यहां उपदेश देंगे। इनमें भी नई चेतना, नया
संस्कार आयेगा। जब ये पृथ्वी पर जायेंगी तब नये उमंग से, नये उत्साह से जाति,
पंथ, संप्रदाय से हट कर विश्व कल्याण में लग जायेंगी। ये सभी सद्विप्र बनकर
विश्व कल्याण मूलक कार्य करेंगे।

मैंने
बुद्ध से पूछा- ऐसा क्यों होता है कि महत्त्वपूर्ण व्यक्ति, सद्गुरु को
समय के व्यक्ति नहीं पहचानते हैं। बुद्ध ने कहा- स्वामीजी एक अनोखा खेल
है। सभी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति समय से पहले पृथ्वी पर करुणावश चले जाते हैं। वे
एक सौ से पांच हजार वर्ष चले जाते हैं। पृथ्वी के समय और देवलोक के समय
एवं सत्खण्ड के समय में अन्तर है। यहां का एक क्षण पृथ्वी पर वर्षों हो जायेगा।
सभी गैर महत्त्वपूर्ण व्यक्ति (प्रतिभाहीन) अपने समय से पैदा होता है। बस
सद्गुरु और तथाकथित गुरु में इतना ही फर्क है। सभी साधारण व्यक्ति अपने
समय के साथ पैदा होते हैं। ऐसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को समझना आसान नहीं होता
है। उसका वर्तमान और अतीत उसे समझने में असमर्थता अनुभव करता है। जब
समय का व्यक्ति समझने योग्य नहीं हो पाते, तब वे उसकी पूजा करना शुरू कर
देते हैं। या तो वे उनका विरोध करते हैं या वे गाली देते हैं। प्रशंसा करते हैं। दोनों
पूजा हैं- एक शत्रु की है, एक मित्र की है।

मैंने धर्मराज के नगरी में आकर सारी व्यवस्था कर दी। धर्मराज ने पूछा-
स्वामीजी! आपके संन्यासी कैसे होंगे ?

हे धर्मराज! मैं अपने शरीर में लौटना चाहता हूं। देखिए अभी पृथ्वी पर दुखी
लोग संन्यासी हो रहे हैं। दुःख उन्हें प्रीति कर लगता है। किसी की पत्नी मर गयी
वह दुखी हो गया और वह संन्यासी बन गया। किसी का धन खो गया, दिवालिया
हो गया वह रोने लगा। दुखी हो गया, उदास चेहरा संन्यासी हो गया। पृथ्वी का
संन्यास मानो दुःख से निकला है। कोई आनंद से भर गया और संन्यासी हो गया
ऐसा उदाहरण नहीं मिलता है। मैं चाहता हूं कि हमारे संन्यासी आनंद को उपलब्ध
 हो। अहोभाव से भरे हों। आनंद में परिवार छोटा पड़ गया अब वह पूरी पृथ्वी को ही परिवार बनाने के लिए संन्यासी बन गया है। दुख से निकला संन्यास ही उदास है। आनंद से निकला संन्यास ही प्रेम से भरा है। आनंद ही आनंद के सागर तक पहुंच सकता है। परमात्मा परमानंद है। सच्चिदानंद है।

हम सभी यह समझ गये कि जो दिखाई पड़ता है वह प्रकृति है। माया है। इसके जो परोक्ष में छिपा है वह ब्रह्मा है। ब्रह्मा के विस्तार के पीछे जो छिपा है वही परम ब्रह्म है, परम पिता है, आदि है। सभी का आदि श्रोत है, उद्गम है। उसी की कृपा होती है। तब आप सद्गुरु से मिलते हैं। जैसे ही आप सद्गुरु के सामने अपने को समर्पित करते हैं मैं का द्वंद्व समाप्त होता है। अद्वैत में चले जाते हैं। सद्गुरु की उपस्थिति से आप अपने स्वभाव में अर्थात् उस परम सत्ता से मिल जाते हैं। आप सभी ने मुझे सुना अपना अमूल्य समय दिया। मेरा सुझाव आप ने माना। जिससे आप सभी का भविष्य सुनहला होगा। वर्तमान ही इतिहास बनता है। वही भविष्य बनता है। अतएव भविष्य एवं अतीत को छोड़कर वर्तमान में जीने की कला सीखना आनंदपूर्वक उत्साह पूर्वक प्रेम में डूबना ही हमारा सर्वस्य संन्यास है। अग्नि की छोटी सी चिंगारी भी बड़े से बड़े जंगल को जला देती है। हमारे अंदर भी आनंद की छोटी सी लहर हमारे हजारों जन्मों के संस्कारों को जला देने में समर्थ होगी। यही लहर बड़े से बड़ा तूफान लेकर आयेगी जिससे समस्त सृष्टि झूम उठेगी। फिर आप एवं परम पुरुष की दूरी समाप्त हो जायेगी। वही आनंद अपने उद्गम श्रोत में मिल कर परमानंद में परिवर्तित हो जायेगा। पूरा विश्व सिमट कर छोटा हो जायेगा। हम सभी उसी परम पुरुष के संतान हैं। यह परमानंद में स्वतः मालूम हो जायेगा। हम अद्वैत है। अद्वैत का स्वभाव आनंद है।

आप सभी के अंदर बैठे परम पुरुष को मेरा नमन है। मेरा नमन स्वीकार करें। अपने चरम उद्देश्य को प्राप्त करे मेरी यही शुभ कामना है। पृथ्वी के कार्यों से फुर्सत मिलते ही आपसे मिलता रहूंगा। इस तरह आपसे हमारी कोई दूरी नहीं है। दूरी समझ की है। यह विस्तार उसी विराट का है। तब दूरी कैसी? सारी दूरी को प्रेम-आनंद समाप्त कर देती है। आनंद में, प्रेम में रहना ही हमारा स्वभाव है।????

क्रमशः...